Top things to do in Berlin during winter

समय की खोह से झांकते बर्लिन का सफर

बर्लिन के टेगेल हवाईअड्डे पर विमान के पैर धरने की देर थी कि कुछ ही देर में एयरोब्रिज उसके सीने से आ जुड़ा और चंद मिनटों में ही हम भी बाहर थे। मगर बाहर तो एयरोब्रिज से निकले थे, अब हैरानगी इसे लेकर थी कि मुश्किल से तीसेक मीटर चलने के बाद ही हम हवाईअड्डे से भी बाहर पहुंच चुके थे! इससे पहले कि कुछ समझ आता, हमारी टैक्सी भी सामने थी। मुस्तफा ने मेरे हाथ से लगेज लिया, डिक्की में लादा और हमारी मंज़िल की तरफ लेकर उड़ चला। करीब डेढ़ सौ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती मर्सीडीज़ की सवारी करते हुए हमारा दिमाग इसी सवाल से गुत्थमगुत्था था कि दुनिया के आधुनिकतम कहलाने वाले शहरों में शुमार बर्लिन का एयरपोर्ट इतना छुटका कैसे हो सकता है? मुस्तफा ने इस राज़ पर से पर्दा उठाते हुए बताया कि टेगेल की बनावट षटकोणीय है, जिसकी वजह से कई बार विमान और सड़क की दूरी मामूली ही बचती है। सुविधा के मामले में इसका कोई तोड़ नहीं हो सकता।

यह तो पहली ही शाम थी, अभी आगे-आगे हमें ऐसे ही और भी कई आश्चर्यों से दो-चार होना था। बर्लिन के क्रिसमस बाज़ारों से मिलने इस तरफ चले आए थे, सुना था कि यूरोप में क्रिसमस की धड़कनें देखनी हों तो जर्मनी एक बार जरूर आना चाहिए। पॉल-रॉबेसन स्‍ट्राबे पर हमारा एयरबीएनबी बुक था, और यहां तक पहुंचने में करीब 20 मिनट लगे। हवाईअड्डे से चले थे तो आसमान पर बादलों के साए जमा थे, जब  यहां पहुंचे तो बूंदा-बांदी शुरू हो चुकी थी। एक तो रात का वक्‍़त, अनजाना शहर और उस पर बारिश के उन छींटों में भीगते हुए सामने इंडियन रेस्‍टॉरेंट से अपने अड्डे की चाबी भी लेनी थी। इस बीच, मुस्‍तफा को हम विदा कर चुके थे। चौथी मंजि़ल पर हमारा अपार्टमेंट था जिस तक पहुंचने की लिफ्ट का वजूद हमें कहीं नहीं दिखायी दिया। थकान खास नहीं थी और यूरोप में घुमक्‍कड़ी की आदतों के चलते लगेज भी ज्‍यादा नहीं था, तो भी सीढि़यों पर सांस फुलाते हुए चढ़ना अफरा था। बहरहाल, अपना ‘घर’ देखकर मन झूम उठा।

बर्लिन में अपना ‘घर’

दो बैडरूम, एक बड़ा-सा लिविंग रूम, किचन, बालकनी और इन सबको आपस में जोड़ने वाला गलियारा मस्‍त था। यह दरअसल, एक आर्टिस्‍ट कपल का घर था जो वैकेशन पर जाते हुए इसे एयरबीएनबी पर लिस्‍ट कर गए थे। होटल या हॉस्‍टल में टिकने की बजाय हमने इस वैकल्पिक ठौर को चुना था ताकि  कुछ तो अलग अनुभव हासिल हो। किचन में पास्‍ता, नूडल्‍स, रेडी टू कुक बिरयानी, करी के अलावा कितनी ही किस्‍मों की हर्बल चाय, कॉफी, अगरबत्तियां भी थीं जिन पर ‘मेड इन इंडिया’ या ‘मेड इन श्रीलंका’ की चिप्पियां चस्‍पां थीं। हमें अपने ‘होस्‍ट’ के पूरब प्रेम का अंदाज़ा होने लगा था। जर्मन समाज को इतने करीब से जानने का यह अवसर अनूठा था।

‘टाइम बब्‍बल’ में सिमटा-लिपटा बर्लिन

शीत का प्रकोप झेलता यूरोप जिन महीनों में खुमारी में होता है उन दिनों मैं इस ओर चली आयी थी। पेड़ों के बदन पतझड़ से थरथरा रहे थे और शहर एक अजब उदासी में था। ऐसे में शीतयुद्ध और नाज़ी दौर की दुश्‍वारियों की याद आना लाजि़म था। मैं उसी शहर में थी जिसने कभी यूरोप के कई इलाकों पर कहर बरपा किया था और फिर खुद महायुद्ध में घुटने टेकने के बाद मुसीबतों के एक लंबे दौर से गुजरा था। यह मौसम का असर था या वो मनहूस वक्‍़त अभी तक अटका रह गया है बर्लिन के जिस्‍म पर कि मुझे हर तरफ अवसाद दिखायी दिया था? अगले दिन नज़दीकी ट्रेन स्‍टेशन बानहोमर स्‍ट्रासे में घुसने से पहले ही सामना हुआ था बर्लिन दीवार के उस छोटे से हिस्‍से से जिसे यहां सहेजकर रखा गया है।

यह वही स्‍टेशन था जहां से कितने ही यहूदी, जिप्‍सी, समलैंगिक, गरीब, रोगी, विकलांग हिटलरी कहर से जान बचाकर भागे थे। स्‍टेशन के बाहर इसी अतीत को दिखाने वाली एक छोटी-सी प्रदर्शनी लगी है।

कुछ देर यहीं ठिठकी रह गई हूं, मेरे आसपास कुछ और सैलानी भी हैं। हर कोई गुम है, चुप है और प्रदर्शनी देख लेने के बाद चुपचाप अपनी राह हो लेता है। उस निष्‍ठुर दौर की त्रासदी के बारे में पढ़कर कोई किसी से कुछ कहना नहीं चाहता। जैसे मुंह पर ताले जड़ दिए हों।

इस बीच, एक मां अपनी गोद की बच्‍ची को साइकिल पर बैठाकर मेरे नज़दीक से गुजर गई है। स्‍टेशन के बाहर पुल के किनारे कई साइकिलें खड़ी हैं, उन यात्रियों की जो ट्रेन में सवार होकर शहर के दूसरे हिस्‍सों तक गए हैं, देर-सबेर लौटेंगे और अपनी साइकिलें उठाकर चल देंगे। एक चेन से सिर्फ हैंडल और पहिए के नाम पर कुछेक इंच भर लोहे का पिंजर ‘बंधा’ पड़ा है। शायद अपने मुसाफिर के लौटने की बरसों से राह तक रहा है। जर्मनी मुझे भीतर तक बींधने लगा है, यह सिर्फ सर्द हवा है या अतीत के नश्‍तर जो चुभते महसूस हो रहे हैं?

 

मैं ऐसे सवालों से पिंड छुड़ाकर सिर्फ टूरिस्‍ट हो जाना चाहती हूं। और रेल में सवार हो गई हूं। मगर खिड़की के कांच के उस पार भी पतझड़ है, असहज बनाता वीराना है जो बराबर पटरियों के संग लिपटा दौड़ता रहा है। कहीं-कहीं कुछ दीवारों पर ग्राफिति के रंग फैले हैं, उनमें चित्र हैं जिनके मायने टटोलने में गुत्‍थमगुत्‍था हूं, हर्फ हैं, लकीरें हैं, कहीं रंगों के छींटे हैं और इन सबों से मिलकर बने वो संदेश हैं जो मेरी समझ से परे हैं। यूरोप के देशों में दीवारों पर इस तरह कितने ही आर्टिस्‍टों की बतरस दर्ज है। मानी समझ में आए या नहीं, इतना तो मालूम है कि ग्राफिति के जरिए हालातों पर विरोध दर्ज कराते हैं कलाकार।

 

अतीत के पन्‍नों सा फड़फड़ाता शहर  

बर्लिन का ऐतिहासिक ब्रांडनबर्ग गेट देखने के लिए महज़ 13 मिनट की मैट्रो की सवारी कर ब्रांडनबर्ग तोर स्‍टेशन पहुंच चुकी थी। अब सिर्फ 3 मिनट दूर मेरी मंजि़ल है, मगर नियति ने बाज़ार की रौनकें भी मेरे नाम लिखी हैं। तमाम शोरूमों में क्रिसमस सेल लगी है। हर तरफ ढेर सारा फैशन, बेहिसाब माल, ग्राहक और चकाचौंध भरी पड़ी है। चॉकलेट, कपड़े, केक, फुटवियर, किताबें, स्‍टेशनरी, बैग, पर्स समेत जाने क्‍या-क्‍या है। मेरा दिमाग हर प्राइस टैग पर दर्ज यूरो को रुपए में बदलने के जोड़-घटा में मसरूफ है। यों ही रुकते-रुकाते मैं शहर के उस प्रमुख गेट पर पहुंच चुकी थी जो बर्लिन की पहचान है। 1987 में इसी गेट से दिए अपने भाषण में अमरीकी राष्‍ट्रपति रीगन ने बर्लिन शहर को दो भागों में तकसीम करने वाली दीवार गिराने का आह्वान करते हुए कहा था – ‘एस गिब्‍ज नूअ एन बरलीन यानी ‘बर्लिन सिर्फ एक है’। नौ नवंबर 1989 को वो दीवार ढहा दी गई जिसने बीते 28 सालों से इस शहर को बेरहम तरीके से दो भागों में बांट रखा था।

आज यह गेट शहर की धड़कन बन चुका है। एक तरफ सीरियाई प्रदर्शनकारी अपना विरोध प्रकट करने जमा हैं, गेट के ठीक सामने यहूदियों का एक ग्रुप हनुका की तैयारी में व्‍यस्‍त है, यह दरअसल, यहूदियों का पर्व है जो हमारी दिवाली से मिलता-जुलता है। कहीं जगलर्स अपने खेल दिखा रहे हैं और इस पूरे समां को खास बना रही है दुनियाभर से यहां पहुंचे सैलानियों की रेल-पेल।

गेट के उस पार भी तस्‍वीरें, सैल्फियां उतारते टूरिस्‍ट हैं, बादलों से ढका आसमान है और सामने ऊंचे दरख्‍़तों का एक लंबा सिलसिला है। बायीं तरफ सड़क पार एक बाग को पार कर हम एक और स्‍मारक में पहुंच चुके हैं।

यह यूरोप के रोमा और सिंता लोगों यानी उन जिप्सियों की याद को समर्पित मेमोरियल है जिन्‍हें नाज़ी दौर में मौत के घाट उतार दिया गया था। जर्मन नस्‍ल के मुकाबले ये रोमा घटिया नस्‍ल के माने गए थे और इन्‍हें देश निकाला दे दिया गया या यंत्रणाओं से गुजारा गया, मारा-काटा गया।

मेमोरियल बेशक, नन्‍हा-सा है लेकिन इसका तेवर बेहद ‘इन्‍टेन्‍स’ है। कुछ गमगीन आंखों से आंसू छलक आए थे और यहां भी हर किसी की बोलती बंद थी। क्‍या यह महज़़ इत्‍तफाक था कि जर्मनी में वो पहला दिन नाज़ी दौर की गुस्‍ताखियों से रूबरू कराने वाले स्‍मारकों के संग बीत रहा था?

जर्मन संसद से शहर का दीदार

रोमा-सिंता मेमोरियल से फर्लांग भर की दूरी पर राइखस्‍टाग यानी संसद भवन है। संसद क्‍या है, सैलानियों के मेले का सबब है। रिपब्लिक स्‍क्‍वायर पर खड़ी यह इमारत 1871 से 1933 तक संसद भवन के तौर पर इस्‍तेमाल होती रही थी, 1933 में इसे आग लगने से भारी क्षति हु्ई और फिर दूसरे महायुद्ध के बाद इसे भुला दिया गया। बर्लिन एकीकरण के बाद इस इमारत की फिर सुध ली गई और 1999 में जाकर इसे नए सिरे से सजा-संवारकर एक बार फिर संसद भवन के रूप में इस्‍तेमाल किया जाने लगा। अब इसके सामने फैले मैदान में हर वक्‍त पर्यटकों की आवाजाही रहती है।

इमारत की छत पर बने ग्‍लास डोम से बर्लिन शहर का नज़ारा क्‍या खूब दिखता है। और हां, टैरेस पर धरे इस ग्‍लास डोम के लिए प्रवेश मुफ्त है लेकिन ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन जरूरी है

बर्लिन के क्रिसमस बाज़ार यानी रौनकों के सिलसिले

अगला दिन हमने बाज़ारों की चहल-पहल के नाम कर डाला था। अगर तफरीह और शॉपिंग का मेल पसंद हो तो यूरोप के तमाम शहरों के बाज़ार क्रिसमस और नए साल के आसपास आपको जी-भरकर लुभाएंगे। ये दिन नए स्‍टॉक, फैशन के अंबार, सेल, डिस्‍काउंट और आकर्षक ऑफर्स से मालामाल होने के होते हैं। दिसंबर के महीने को क्रिसमस की धूमधाम, परिवारों के मिलन, छुटि्टयों, यात्राओं से लेकर खानपान और शॉपिंग पर कुर्बान करने की परंपरा है। जर्मनी भी इस मोर्चे पर आगे है और बर्लिन के क्रिसमस मार्केट तो अपनी चहल-पहल, गर्मजोशी और बरसों पुरानी रिवायत के चलते टूरिस्‍ट आकर्षण बन चुके हैं।

राजधानी में अमूमन पचास ऐसे बाज़ार हर साल लगते हैं, ये आमतौर पर शहर के प्रमुख स्‍मारकों, होटलों या अन्‍य आकर्षणों के नज़दीक होते हैं। नवंबर के आखिरी हफ्ते से अगले महीने भर तक क्रिसमस बाज़ारों की चहल-पहल बनी रहती है। कुछ में प्रवेश मुफ्त होता है तो कई मामूली एंट्री फीस लेते हैं।

येंदरमेनमार्केट क्रिसमस बाज़ार

अगर आपने पहले कभी क्रिसमस बाज़ार नहीं देखे तो मन में सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर क्‍या होता है वहां। चलिए लिए चलते हैं आपको बर्लिन के पुराने और लोकप्रिय येंदरमेनमार्केट क्रिसमस बाज़ार के सफर पर। यह बाज़ार ऐतिहासिक स्‍क्‍वायर पर सजता है जो तीन प्राचीन इमारतों से घिरा है। बाज़ार में लकड़ी के स्‍टॉल्‍स लगाए जाते हैं, किसी में खान-पीन के सिलसिले तो कहीं ईसा मसीह के जन्‍म और जीवन की झांकियां होती हैं, किसी में दुनियाभर से आए खास चॉकलेट-चीज़, उम्‍दा फल-फूल, बियर, वाइन, तरह-तरह के मीट के अलावा हैंडमैड प्रोडक्‍ट्स। हाथों से बने नाजुक गहने, स्टेशनरी आइटम, घरेलू साज-सजावट का सामान, किताबें और कपड़े भी।

जब आसमान से सर्दी बरसती है तो इन बाज़ारों में गरमा-गरम खानों की बहार लोगों को सहारा देती है। बियर के अलावा धुंआ उड़ाती मल्‍ड वाइन के चाहने वाले खूब होते हैं यहां।

कड़ाहों में खौलते मशरूम, सिकते कबाब, भुनता गोश्‍त, महकती कॉफी-चॉकलेट के स्‍टॉल्‍स पर भीड़ सबसे ज्‍यादा रहती है। हर दिन लाइव बैंड और म्‍युजि़क परफॉरमेंस भी होती हैं।

बर्लिन के दूसरे प्रमुख क्रिसमस बाज़ारों में शार्लटनबर्ग, पॉत्‍सदामर प्‍लात्‍ज़ शामिल हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी ओपन आर्ट गैलरी – ईस्‍ट साइड गैलरी

बर्लिन वो शहर है जिसकी गलियों में आपको कला की जुबानी शहर की कहानी सुनायी देती है। शहर की दीवारें आपसे खुद एक राब्‍ता कायम कर लेती हैं। और जब दीवार का जिक्र चला है तो उस दीवार को कोई कैसे भूल सकता है जिसने पूरे 28 साल बर्लिन को पूरब और पश्चिम के खांचों में बांटकर रखा था।

बर्लिन वॉल जिसे अब ईस्ट साइड गैलरी में तब्दील किया गया है

शीतयुद्ध की देन थी बर्लिन वॉल जिसे 1960 में कांटेदार तारों वाली बाड़ की जगह खड़ा किया गया था। इसे बनाने के कारण कई थे, उनमें से एक यह था कि पूर्वी जर्मनी से बड़ी संख्‍या में डॉक्‍टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि बेहतर भविष्‍य की तलाश में पश्चिमी जर्मनी जाकर बस रहे थे। इसे रोकने के लिए पूर्वी जर्मनी की जीडीआर (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) सरकार ने ही करीब 140 किलोमीटर लंबी इस दीवार को खड़ा किया था। लेकिन 1989 में जब पूर्वी यूरोप के देशों में क्रांति की सुगबुगाहट हुई तो पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का भेद मिटाने की मुहिम भी तेज़ हो गई, परिणामस्‍वरूप बर्लिन वॉल तोड़ दी गई। सिर्फ 1316 मीटर लंबी दीवार का हिस्‍सा बचा रहा जिस पर 1990 में दुनियाभर के आर्टिस्‍टों ने तरह-तरह की पेंटिंग्‍स कर इसे खुले आसमान तले खड़ी एक बड़ी कला दीर्घा बना डाला।

ब्रेझनेव और हॉनेकर की विख्‍यात तस्‍वीर ‘द किस’ की तर्ज पर इस वॉल पर बनी ग्राफिति सबसे ज्‍यादा पसंद की जाती है। हर कोई आकर इसके सामने अपनी एक मुकम्‍मल तस्‍वीर उतरवाए बगैर लौटना नहीं चाहता।

‘द किस’

बर्लिन में मुलनस्‍त्रासे के नज़दीक स्‍प्री नदी के किनारे खड़ी ईस्‍ट साइड गैलरी को देखने आज द‍ुनियाभर से  पर्यटक जमा होते हैं। नज़दीकी ऑस्‍तबानहॉफ स्‍टेशन तक आप एस-बान मैट्रो रेल से पहुंचकर पैदल यहां आ सकते हैं।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का जाल

बर्लिन में बसों के अलावा लंबी और कम दूरी का विशाल मैट्रो नेटवर्क है, मैट्रो एस-बान और यू-बान कहलाती है। इनके अलावा, कई रूटों पर ट्राम भी सरपट दौड़ती हैं। प्राइवेट कैब और ऊबर तो हैं ही।

और हां, शहर में जगह—जगह ऐसे साइकिल स्टैंड भी हैं। जब जी चाहे, इन एॅप आधारित साइकिलों की सवारी भी की जा सकती है।

वीगन और वेजीटेरियन्‍स की बल्‍ले-बल्‍ले

मांसाहारी यूरोप में वीगनिज्‍़म की लहर को अगर किसी शहर ने तबीयत से पोसा है तो वो बर्लिन है। शहर में जगह-जगह वीगन कैफे हाउस, रेस्‍टॉरेंट हैं।

वीगन स्‍टोर्स भी कम नहीं हैं जहां से आप अपने लिए वीगन ब्रेड, बटर, ऑयल, चीज़, मिल्‍क-योगर्ट आदि खरीद सकते हैं। और मज़े की बात है कि वेजीटेरियन भोजन पसंद करने वाले लोगों को स्‍वाद या वैरायटी के मामले में रत्‍ती भर समझौता नहीं करना पड़ता। शहरभर में मनपसंद खान-पान के ढेरों विकल्‍प उपलब्‍ध हैं।

टर्किश वेजीटेरियन व्यंजनों का जवाब नहीं

बर्मी, थाई, लेबनीज़, चाइनीज़, कोरियन, टर्किश समेत कई किस्‍म का वीगन और शाकाहारी खाना यहां मज़े से मिलता है। और तो और, वीगन बियर और वाइन का लुत्‍फ भी उठाया जा सकता है।

गर्मियों का मौसम आने ही वाला है, तब बर्लिन शीत निद्रा से बाहर होगा, सड़कों पर बेहिसाब रौनकें लौट चुकी होंगी, म्‍युजि़क फेस्टिवल्‍स के जलवे होंगे और शहर नई सज-धज के साथ बांहे पसारे खड़ा होगा। तो चलें, बर्लिन?

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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