Street performers of Europe

My Busking Diary

यूरोप में बस्किंग यानी सड़कों-गलियों पर संगीत, नृत्य, कला के प्रदर्शन या नुक्कड़ नाटिका जैसी प्रस्तुतियां बेहद लोकप्रिय हैं। इतनी कि इस महाद्वीप के अमूमन हर देश के हर शहर में प्रमुख आकर्षणों, ​लोकप्रिय ठिकानों के आसपास ‘बस्कर्स’ दिख जाते हैं — अपने हुनर का प्रदर्शन करते हुए। मैट्रो के प्लेटफार्मों तक गुजरते रास्तों, फुटओवर ब्रिजों, सब-वे, पार्कों और हाइ स्ट्रीटों से लेकर साप्ताहिक हाट बाज़ारों से गुजरते हुए, थके कदमों को अगर कुछ रुकने-थमने का इशारा होता है तो वो वाकई इन अनाम, गुमनाम, बेनाम कलाकारों की प्रस्तुतियां ही हैं।

अपनी यूरोप यात्राओं में, वियना से बर्लिन तक और ज्युरिख़ से सेविया, मादरीद, लिस्बन, पोर्तो तक में, चेकोस्लोवाकिया में, रोमानिया में और यहां तक कि दुनिया की दिलफरेब फैशन बस्ती मिलान की सड़कों-प्लाज़ाओं पर ऐसी कितनी ही म्युज़िकल परफॉरमेंस देखते हुए उन्हें अपने कैमरे में समेट लाने का मोह कई बार संवरण नहीं कर पायी हूं।

यूरोपीय शहरों के इस रोचक सफर पर निकल पड़िए मेरे संग। संगीत सुनेंगे, उस संगीत पर थिरकते बिंदास कदमों की थिरकन निहारेंगे, थोड़ा हम—आप भी गुनगुनाएंगे, झूमेंगे। ज़िंदगी को ‘सीरीयसली’ नहीं ज़िंदादिली से बिताएंगे।

इनमें कुछ आपको हंसाएंगी और यकीन मानिए, कुछेक धुनों को सुनकर आपके गालों पर एकाध आंसू भी ढलक जाएगा।

#soundscapeOfStreets याद रखिए। और इंटरनेट के महासागर से जब जी चाहे इसकी मदद से यूरोपीय शहरों की बस्किंग का लुत्फ उठाइये।

मेरे YouTube channel के जरिए मेरी यूरोप यात्रा से जुड़ने का यह एक और बहाना है। बने रहिए मेरे संग, मेरे ब्लॉग और यूट्यूब चैनल के संग और बस्किंग के जरिए जानिए यूरोप के जाने-अनजाने शहरों के अलग-अलग ठिकानों के बारे में। हर बार, एक नई जगह से बस्किंग के इन सितारों को आपसे मिलवाती रहूंगी।

चलते हैं यूरोप के सबसे पुराने और सबसे बड़े साप्ताहिक बाज़ार एल-रास्त्रो (El-Rastro) में बस्किंग देखने-सुनने।

‘बस्किंग’ के बारे में
सार्वजनिक स्थानों पर यों अपनी कला की नुमाइश करने वाले ये कलाकार ‘बस्कर्स’ कहलाते हैं और इनकी प्रस्तुति ‘बस्किंग’। यूरोप के तमाम देशों में बस्किंग पूरी तरह कानूनी है और ये कलाकार परमिट/लाइसेंस लेकर ही परफॉरमेंस दे सकते हैं। अलबत्ता, अमरीका समेत कई जगहों पर बस्किंग आज भी गैर-कानूनी है।

‘बस्किंग’ क्या नहीं है
और जो भी हो, यह भिक्षावृत्ति तो कतई नहीं है। बस्कर्स गा-बजाकर अपना हुनर पेश करते हैं। यह उनका ‘पेशा’ है, लेकिन वे हाथ नहीं फैलाते। अपने वाद्यों के कवर खोलकर या किसी कटोरे, पात्र (टिपबॉक्स) को आजू-बाजू रखकर छोड़ देते हैं ताकि उनकी कला, मेहनत और जज़्बे को देख-सुनकर आप यानी दर्शक ‘टिप’ छोड़ जाएं। वे आपसे कुछ मांगते नहीं हैं, ऐसा करने पर हो सकता है कि वे स्थानीय भिक्षाविरोधी कानूनों की गिरफ्त में आ जाएं।

बतौर दर्शक/श्रोता आप क्या कर सकते हैं
आमतौर पर इस तरह की यकबयक प्रस्तुतियों को देखने-सुनने के बाद अपना पर्स-बैग टटोलें, कम से कम एक यूरो/डॉलर से शुरू कर अधिकतम अपनी श्रद्धानुसार टिप बॉक्स में डाल दें। आप बस्कर्स को पैसे देने की बजाय उनके लिए ​खाना-पीना भी खरीद सकते हैं, मगर ऐसा करने से पहले उनसे पूछ लें। और हां, बस्कर्स को टिप देना भिक्षावृत्ति को बढ़ावा देना नहीं है। यह उन कलाकारों के प्रति आपका आभार जताने का एक तरीका भर है जिन्हें किस्मत ने बड़ा ‘स्टार’ तो नहीं बनाया लेकिन जिंदगी ने सम्मान के साथ, अपनी प्रतिभा और हौंसले के दम पर जीने का जरिया जरूर दिया है।

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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