Kausani and Baijnath – 1 day trip from Ranikhet

 प्रकृति उत्सव का हिस्सा बनने के लिए चले आइये कौसानी
~ मिलिए छायावादी कवि पंत से
~  बैजनाथ के ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन के बगैर अधूरा है कौसानी सफर

कौसानी पहुंचकर महसूस होता है कि हम अपनी विरासत और इतिहास को लेकर सचमुच बेपरवाह हैं। दोपहर की तीखी धूप से बचते-बचाते हम छायावादी युग के कवि सुमित्रानंदन पंत के पैतृक घर का पता कौसानी की मुख्य सड़क पर पूछने में लगे थे। कस्बाई कौसानी अपने साहित्यिक अतीत को लेकर इस हद तक लापरवाह था कि मुख्य मार्ग पर उसका कहीं कोई नामो-निशान नहीं था। यानी अगर आप बिना इस जानकारी के कौसानी पहुंच गए कि कभी प्रकृति का यशोगान करने वाले सुमित्रानंदन पंत ने यहीं से हिमालय की अद्भुत श्रृंखलाओं से प्रेरणा पायी थी, तो यकीनन इसे देखने से चूक सकते हैं। जिस होटल मालिक से मैंने पंत वीथिका का पता जानना चाहा उसने पहले तो मुझे ऐसे देखा जैसे मैं किसी अंतरिक्ष नगरी का पता पूछ रही हूं! फिर बड़ी बेरूखी से जवाब दिया – “वो चैराहे पर वूलन हाउस के ऊपर ही है पंत जी का मूजियम, पर कुछ खास है नहीं वहां!”

खैर, उस चैराहे से न हम दूर थे और न पंत जी की वीथिका। कुछ सीढ़ियों को पार करते हुए, दोनों ओर उग आयी तरह-तरह की दुकानों में झांकते हुए और पंत जी कविताओं को याद करने की कोशिश में हम अब उनके घर के आंगन में खड़े थे। पत्थर की उनकी प्रतिमा हिमालयी श्रृंखलाओं की ओर पीठ किए खड़ी थी, क्या किसी को यह भी नहीं सूझा होगा कि प्रतिमा का मुख हिमालय दर्शन करता हुआ होना चाहिए था!

बहरहाल, एक गाइड उस घर में मौजूद था जिसे अब पंत वीथिका के नाम से जाना जाता है। करीब 20-22 बरस पहले भी इस घर में आयी थी, तबसे अब में फर्क बस इतना दिखा कि वो कोरा माटी का घर अब कुछ पत्थर-कंक्रीट से पक्का कर दिया गया है।

पंत जी की कुछ निजी वस्तुओं, ढेरों किताबें और कई निजी तस्वीरों से भरा-पूरा होते हुए भी वो घर मुझे अधूरा-अधूरा लग रहा था। एक बड़े हॉल को, जो मूल आवाास का हिस्सा नहीं है बल्कि बाद में उसका निर्माण किया गया है, उनकी लाइब्रेरी का रूप दिया गया है। इसी में हर साल 20 मई को पंत जी की जयंती के मौके पर कुछ कवि-साहित्यकार जमा होते हैं और उस एक दिन उनकी स्मृतियों की अच्छी धुलाई-रंगाई हो जाती है।

Pant Ji’s study corner

कहते हैं वक़्त हर जख़्म भर देता है, तो क्या उत्तराखंड में अब वक़्त ने बीतना बंद कर दिया है ? कम-से-कम कौसानी में पंत वीथिका को देखकर तो ऐसा ही लगा। पंत जी की पुस्तकों का विशाल संग्रह ललचा रहा था और मुझे हैरत हुई देखकर कि कुछ बुकशैल्‍फों में तो ताले लगे थे लेकिन कुछ खुले भी पड़े थे, यहां तक कि कुछ के कांच के पल्ले भी टूटे हुए थे। किसी को फुर्सत नहीं है हिंदी साहित्य की इस धरोहर को समय रहते संभालने, संजोने की।

An old photograph of Pant Ji with Hariwansh Rai Bachchan and Amitabh Bachchan

वीथिका की सीढ़ियों को जिस उत्साह से मैंने चढ़ा था, उतने ही भारी मन से मैं उतर आयी थी। छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले, तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूं लोचन! छायावाद के ऐसे ही तरानों को मन ही मन गुनगुनाते हुए हमने पंत जी के पैतृक निवास से विदा ली।

अनासक्ति आश्रम में सुरक्षित हैं गांधी जी की यादें

कौसानी नन्हा-सा ही सही, मगर किसी ज़माने में गांधी जी की आंख का तारा भी हुआ करता था। हम अब अनासक्ति आश्रम की ओर बढ़ रहे थे, छोटी-सी घुमावदार पहाड़ी पार कर कौसानी के संभवतः सबसे ऊंचे ठिकाने पर हम पहुंच चुके थे। 1929 में भारत भ्रमण पर निकले गांधी जी ने तन और मन की थकान  उतारने के लिए दो दिन कौसानी रुकने का मन बनाया था, लेकिन कहते हैं यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और शांत माहौल ने उन्हें ऐसा ललचाया कि वे करीब दो सप्ताह यहां रहे। और इसी प्रवास के दौरान उन्होंने श्रीमद्भागवत पर अपनी विख्यात टीका ”अनासक्ति योग” लिखी थी। गांधी जी के उस प्रवास की स्मृतियों को संजोने वाले स्थल को ही आज अनासक्ति आश्रम में बदल दिया गया है।

Anasakti Ashram

इस आश्रम के अहाते से नीचे कत्यूर घाटी के दर्शन होते हैं और सामने हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं का दीदार होता है। पिछली बार कौसानी में इसी आश्रम में हम ठहरे थे और कौसानी के उस अद्भुत सूर्योदय की याद आज तलक मेरे स्‍मृति प्रदेश के सौभाग्‍य की तरह कायम है। अलस्सुबह आंखे मसलते हुए हम बाहर अहाते में आए तो वहां जमा सैलानियों की भीड़ देखकर अचरज में पड़ गए थे। और नीचे से ऊपर आ रही सड़कों-पगडंडियों पर से कई जोड़ी पैर लगातार आश्रम की ओर बढ़ते दिखायी दे रहे थे। पता चला कि सूर्य की बाल-लीलाओं का दर्षन करने कौसानी में रुके सैलानी हर सुबह यहीं चले आते हैं। ठंड से नहायी उस सुबह कत्यूर घाटी जैसे गायब हो गई थी, बादलों के बड़े-बड़े गुच्‍छे घाटी पर उतरकर रात से ही कब्जा जमा चुके थे। सफेद, रूई के फाहे भर नहीं थे वो बादल बल्कि पूरी घाटी पर चादर की तरह पसरे हुए थे। पहाड़ों से उतरकर पूरी घाटी को अपनी ओट में ले चुके बादलों का वो नज़ारा अद्वितीय था। हमें लगा कि आज का सूर्योदय तो बादलों ने निगल लिया है, लेकिन तभी घाटी में सामने की ओर आसमान की रंगत पलटने लगी। एक विशाल नारंगी गोला नीचे से उगकर घड़ी की टिक-टिक-सा ऊपर उठा चला आ रहा था, और अनासक्ति आश्रम के अहाते में एक साथ सलौनियों की आश्‍चर्य मिश्रित चीख हवा में घुल गई। सूरज का इतना बड़ा गोला, साइकिल के पहिए जैसे आकार का, अब अपनी थिरकन के साथ लगातार बादलों को पटखनी देते हुए ऊपर उठ रहा था। शायद बीस-बाइस सेकंड में यह पूरा दृश्‍य सिमट गया होगा। लोगों ने भी लौटना शुरू कर दिया था, और कौसानी के बागानों से चुनी चाय की खुश्‍बू से सराबोर केतली-प्याले लिए आश्रम का केयरटेकर हमें अपने कमरे की ओर बढ़ते दिखा।

उस दफा इन बागानों को देखने से चूक गए थे, इसलिए इस बार भूल-सुधार करने का मन है। कौसानी की ढलानों पर चाय बागान छितराए तो हैं लेकिन ये उतने विशाल इलाके में नहीं फैले हैं जैसे केरल में मुन्नार की पहाड़ियों या असम में सड़कों के दोनों ओर दूर तलक दिख जाते हैं। कौसानी की गिरियास चाय के कुछ विज्ञापन दिखायी दिए जिनमें दावा किया गया था कि इस चाय का निर्यात आस्ट्रिया, जर्मनी, आस्ट्रेलिया समेत कई देशों को किया जाता है। मगर विज्ञापनों के मायावी संसार को टटोलने का हमारा कोई इरादा नहीं था। यों भी, हिमालय जैसे विराट पर्वतों की छाया में तमाम इंसानी दावे कितने बौने हो जाते हैं, यह महसूस करने के लिए ही तो हम उत्तराखंड आए थे!

गोमती किनारे शिवधाम – बैजनाथ (कौसानी से बैजनाथ — 17 किमी)

हम कौसानी—बागेश्वर मार्ग पर बढ़ चले थे। कौसानी के चीड़ से घिरे वनों से निकलने के बाद एकाएक गरुड़ घाटी में पहुंचकर झटका लगता है। इस छोटे से शहर में दुकानों, वाहनों, आबादी और कंक्रीट की इमारतों का घटाटोप इतना भयावह लगता है कि आप तुरत-फुरत यहां से भाग निकलना चाहते हैं। हालांकि उत्तराखंड पर उपलब्ध तमाम गाइडबुक्स इस शहर को सैलानियों के लिए शॉपिंग ठिकाने के रूप में पेश करती हैं, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि गरुड़ के बाजार में लोकल आबादी के लिए रोज़मर्रा की जरूरतों का सामान ही ज्यादा है, सैलानियों के लिए सुविनर खरीदारी के अवसर यहां लगभग न के बराबर थे। बहरहाल, हमें तो आगे कर्णप्रयाग मार्ग पर बैजनाथ के प्राचीन मंदर समूह पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए गरुड़ की अनदेखी करने में ही समझदारी लगी।

Baijnath temple complex with a leaning temple on extreme right

पारंपरिक मान्‍यता है कि गोमती और गरुड़ गंगा के संगम पर ही शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। इसी गोमती, गरुड़ गंगा और लुप्त सरस्वती के संगम पर कत्यूरी राजा ने इन मंदिरों को रातों- रात बनवाया था, जो मंदिर रात भर में पूरे बन सके वे पूर्ण रूप में हैं जबकि मुख्य मंदिर समूह से कुछ दूर गांव में खड़े कुछेक मंदिर अधूरे भी हैं। कहते हैं ये मंदिर पूरे नहीं बन पाए और सवेरा हो गया तो इन्हें अधूरा ही छोड़ दिया गया। मुख्य समूह में शिव मंदिर सबसे प्रमुख है जिसमें पूजा-अर्चना होती है, एक अन्य मंदिर में पार्वती की विशाल प्रतिमा है और यहां भी पूजा होती है। मंदिर समूह में केदारेश्‍वर, बामनी मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर समेत कुल-मिलाकर 18 छोटे-बड़े मंदिर हैं।

बैजनाथ के इन मंदिरों को नागर शैली में बनाया गया है और लगभग 11वीं-12वीं सदी में इनका निर्माण कराया गया था। तबसे खुले आसमान के नीचे, बीती कई सदियों से कार्तिकेयपुर (बैजनाथ का तत्कालीन नाम) के ये मंदिर यों ही खड़े हैं।

the glorious age of Kumaoni architecture during the reign Katyuri kings

मंदिर में स्थानीय निवासियों और सैलौनियों की चहल-पहल बता रही थी कि इनकी कितनी ख्याति है। बड़े-बूढ़े मंदिर परिसर में आस्था के पलों को गिनने में व्यस्त थे तो तमाम युवक सामने बहती गोमती की धार में पैर टिकाए बैठे दिखे। इस धार में रोहू मछलियों की भरमार थी जिन्हें पकड़ने की मनाही है, लेकिन चना-चबेना खिलाने की खुली छूट है। जिस शिद्दत से लोग उन्हें खिलाने में व्यस्त थे उसे देखकर एक बार तो मन में यह ख्याल भी आया कि कहीं मछलियों को दाना देना भी आस्था का ही तो कोई आयाम नहीं!

रानीखेत और आसपास के ठिकानों पर केंद्रित 4 भागों की सीरीज़ में यह दूसरा भाग है। पहले भाग के लिए इस लिंक पर क्लिक करें Ranikhet

 

 

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