Ranikhet – a trip down memory lane

रानीखेत – यादों का सफर

बीते महीने काठगोदाम से भीमताल, नैनीताल, भवाली होते हुए अल्मोड़ा, रानीखेत और आगे द्वाराहाट, दूनागिरी की पहाड़ियों तक लगभग  650 किलोमीटर का फासला नापते हुए सुखद आश्चर्य में थी कि एक गड्ढा क्या गड्ढे का बच्चा तक नहीं था! फर्राटा लगाते नेशनल हाइवे, चिकनी-चमचमाती सड़कें, ताज़ादम पेंट से नहायी हुईं और उतने ही नए-नकोरे माइलस्टोन। माना कि उत्तराखंड में टूरिज़्म को उसकी क्षमता के हिसाब से भुनाया नहीं गया है अब तक, न यहां ललचाते टूरिस्ट सर्किट हैं और न भरमाते—लुभाते डेस्टिनेशन। तो भी कुछ है जिसे सिर्फ खास निगाहें ही देख पाती हैं, आखिर पहाड़ी राग सुनने के लिए दिल भी तो वैसा ही चाहिए, न!

काफल के पेड़ों की छांव और खुबानी की मिठास की यादों के सिरे पकड़े मैं लौट आयी हूं हिमालय की उन्‍हीं वादियों में जहां से पिछली दफे नंदा देवी और नंदा कोट की यादों की गठरी भर लायी थी। त्रिशूल की भव्‍य उपस्थिति भी कहां भूलती है। मगर इस बार धुंध और बादलों का ऐसा घमासान है कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह वही जगह है जिसके क्षितिज पर हिमालयी चोटियों का नयनाभिराम दृश्‍य हर पल टंगा रहता है। वो जाड़े में लिपटा रानीखेत था जो अब बारिशों में नहाया मिला।

nothing quite like monsoons in the verdant mountains

मॉल रोड से सटे कुमाऊं मंडल विकास निगम के सैलानीगृह में रुकना तय हुआ, ऑफ सीज़न की माया है कि पूरे तीस फीसदी डिस्‍काउंट मिला और हम खुश थे कि खूब फैलकर रहेंगे, मनमर्जी का ब्रेकफास्‍ट-डिनर करेंगे और हमारी कॉटेज के सामने डटे बलूत के दरख्‍़तों पर सुबह-शाम उतराते-तैरते कुंहासे को चीरने की हिमाकत रखने वाले सूरज की गुस्‍ताखियों को हम भी देखेंगे। रानीखेत जैसे हिल स्‍टेशनों का यही तो मज़ा है, ठंड से किटकिटाते हाथों को नरमाई का फाहा लगाने वाली धूप भी अक्‍सर खिली मिलती है।

KMVN rest house, Mall Road

चौमासे में पहाड़ का सफर – कुछ भीगे, कुछ ठिठके

आषाढ़ में इस तरफ चले आए हैं, बारिश की बूंदों ने नैनीताल की चढ़ाइयां चढ़ते-चढ़ाते ही हमारे संग हो लेने का मानो गुपचुप करार कर लिया था। और हमें तो जैसे इसी बहाने की तलाश थी। नैनी झील को तकते बाज़ार में एक कैफे हाउस में रुके, केक-सैंडविच पर टूटे और अपरोध-बोध घटाने की खातिर एक-दूसरे से कहते फिरे थे कि आगे तो सिर्फ और सिर्फ कुमाऊंनी भोजन करेंगे, सो आज इस इंग्लिश ब्रेकफास्‍ट का लुत्‍फ लिया जाए।

रानीखेत तक सिर्फ 56 किलोमीटर का फासला बाकी रहा था और रास्‍ते का मिज़ाज़ बदलने लगा था।

भवाली की आबोहवा पार कर हम आधुनिक तीर्थ कैंचीधाम आ लगे जो नीम करौली बाबा आश्रम की लोकप्रियता का आज भी गवाह है। समुद्रतल से 1400 मीटर ऊंचाई पर इस बने इस आश्रम में आने वाले भक्‍तों, सैलानियों और उनके बहाने छोटी-मोटी दुकान-स्‍टॉल चलाने वालों से पूरा इलाका गुलज़ार था। यहां हनुमान मंदिर है, दुर्गा और राम की मनोहारी छवियों वाले मंदिर भी।

Neem Karoli Baba Ashram at Kainchi Dham

मान्‍यता है कि बाबा नीम करौली खुद हनुमान के अवतार थे। मां को भी ले आयी हूं इस ‘मॉडर्न’ तीर्थ में, क्‍योंकि सीढि़यों पर चढ़ने-उतरने में उनका सहारा बनने वाली रेलिंग हैं, हर तरफ बेइंतहा सफाई है, रैंप हैं और चढ़ावे, प्रसाद के लिए कोई मारा-मारी, लूट-पाट नहीं है। कहते हैं ’70 के दश में भारत में अध्‍यात्मिक सफर पर निकले स्‍टीव जॉब ने इसी कैंची धाम में अपने आगे के व्‍यावसायिक जीवन की प्रेरणा हासिल की थी। यहीं से अमरीका लौटकर उन्‍होंने उसी एप्‍पल कंपनी की नींव रखी थी जिसके आइफोन, आइपैड और आइमैक लिए हम इतराते फिरते हैं।

यहां से आगे अब हमारी मंजिल तक सिर्फ 20 किेलोमीटर की दूरी बाकी थी। पहाड़ की गोलाइयां नापती हमारी इनोवा मस्‍तचाल चल रही थी, सड़कों पर खुमारी तारी थी। इस तरफ न वो भीड़ थी, न ट्रैफिक जाम जिसने हाल में गर्मियों की छुटि्टयों में उत्‍तराखंड के हिस्‍से खूब बदनामी लिख डाली थी। दरअसल, मैदानों की गर्मी और बोरियत ने शहरवालों को पहाड़ों की याद तो दिलायी लेकिन भेड़चाल के मारे सैलानी सब के सब गढ़वाल में चारधाम यात्रा पर चल निकल पड़े। हम इस मामले में भाग्‍यशाली निकले, लेकिन उसके पीछे ठोस वजह थीं। एक, कुछ अलग मंजि़ल चुनी थी और दूसरे, वक्‍त भी सोच-समझकर तय किया था।

रानीखेत – पुरखों के आंगन में

उत्‍तराखंड के अलमोड़ा जिले की तहसील है रानीखेत और हमारे लिए इससे भी ज्‍यादा और बहुत कुछ। पहाड़ों से इश्‍क का जो अलाव हमारे सीने में सुलगता रहा है बरसों से, उसका सबब है रानीखेत रिज को तकती वो वादियां, वो चीड़-देवदार-काफल-अखरोट के दरख्‍़त और हिमालयी श्रृंखलाओं का बदन छूकर चली आने वाली वो हवाएं जिन्‍हें मेरे पुरखे सांसों में उतारा करते थे।

दरअसल, इस हिलस्‍टेशन को हम अपना ‘घर’ भी कहते हैं, पुरखों वाला, असल वाला वो घर जहां से पिछली जाने कितनी पीढि़यां कूच कर चुकी हैं – शहरी जिंदगी के ख्‍वाब आंखों में सजाए, फिर कभी न लौटने के लिए। 

माइग्रेशन के दर्द झेलते पहाड़ों से मिलने चले आना आसान कब होता है। वहां सौ-सवा सौ साल पुराना घर होता है, घर के आंगन की ढहती चहारदीवारी होती है, दरकती रसोई में सूना चूल्‍हा, बिन धुंए वाली चिमनी, दादी का बिन धूप-बाती का  मंदिर होता है … और उस सूनेपन को महसूसते आपके सीने में मचा हाहाकार भी तो होता है।

बहरहाल, पहाड़ की इस पीड़ा को जज्‍़ब कर हम रानीखेत छावनी की तरफ चल दिए थे। छावनी परिसर में झूला देवी मंदिर बेशुमार घंटियों से लदा है, गवाह है उन मन्‍नतों का जो पूरी हो चुकी हैं। मंदिर में एक परिंदा भी नहीं है, न जेब काटते पंडे हैं, न गंदगी है। सिर्फ सुकून बिछा है और उसी के गलीचे पर पैर धरकर मैं मंदिर की परिक्रमा कर आयी हूं। पूरे परिक्रमा पथ पर हर आकार-प्रकार की पीतल की घंटियां बंधी हैं। मेरे भी होंठों पर एक नन्‍ही-सी कामना तैर आयी है और अब इस इंतज़ार में हूं कि झूला देवी के आंगन में सजी उन हजारों-हज़ार घंटियों में कब एक मेरी वाली घंटी भी सजेगी, कब मैं भी फिर लौटूंगी हिमालय की निगहबानी वाले अपने आंगन में।

Jhula Devi temple

भीड़ से परे पर्यटन और प्रकृति का रसरंग – चौबटिया गार्डन

दूसरे दिन चौबटिया गार्डन जाना तय कर चुकी थी हमारी आवारगी। मॉल रोड से करीब दसेक किलोमीटर के फासले को नापने में यों ज्‍यादा वक्‍़त नहीं लगता है लेकिन बारिश में नहायी, साफ-सुथरी सड़कों और नए-नकोरे पेंट से सजे-धजे माइलस्‍टोन हमें ललचा रहे थे।

फिर जंगल का अपना संगीत राग भी बज रहा था और इन सबों से अपनी इंद्रियों पर हो रहे हमलों से कौन बेज़ार रह सकता है। लिहाज़ा हमने इनोवा हांकने में जुटे अपने ड्राइवर जीवन से गाड़ी को लगाम लगाने को कहा। पहाड़ की सीलन भरी हवाओं को दिल में उतारना जो ठहरा! हमारे सामने सांप-सी गुज़र रही थी जो सड़क उसके किनारे ठिठकना जो बनता था। वो सफर भी क्‍या सफर जिसमें रुक-रुककर चलना न हुआ। कैमरों की मेमोरी भरने की खातिर भी रुकना जरूरी था, फिर मोड़-दर-मोड़ व्‍यू प्‍वाइंट थे, सीढ़ीदार खेतों में धान रोंपती, कमर दोहरी झुकाए प्रार्थनामग्‍न-सी पहाड़ी औरतें थीं, बारिश और सर्दी के मौसम में चारे की कमी का अभी से इंतज़ाम करने में जुटी वो युवतियां-औरतें थीं जो जाने कहां-कहां से घास-लकडि़यां ढो रही थीं। पहाड़ी समाज को उसकी रोज़मर्रा की भागा-दौड़ी में देखना मेरे अनुभव संसार को हमेशा से रास आता रहा है। उस रोज़ भी मुफ्त वाले इन आकर्षणों से अपना सफरी संसार समृद्ध करने के बाद ही मैं आगे बढ़ी थी।

चौबटिया गार्डन में घुसते ही नसीर गाइड के साथ हमने दो मिनी ट्रैक तय किए – पहला सेब के बागान से गुजरता था, लेकिन इस साल बेमौसमी बारिश और ओलों ने सेब की फसल बर्बाद कर डाली थी, लिहाज़ा इस बागान में सिवाय हरियाली के कुछ नहीं था। कुछ अखरोट-बादाम के पेड़, चेस्‍टनट के बुलंद दरख्‍़तों पर उत्‍पात मचाती वानर सेना, फूलों की क्‍यारियों और उन क्‍यारियों से झांकते टॉर्च लिलि के केसरिया फूलों की बहार थी। कैमोमाइल, अश्‍वगंधा जैसी जड़ी-बूटियां किनारे-किनारे संग-संग थीं।

Chaubatia botanical Garden

1 किलेामीटर का रास्‍ता आधे घंटे में निबटाकर जब तबीयत नहीं भरी तो दूसरे ट्रैक के लिए घने जंगल में घुस लिए थे हम।

यह करीब डेढ़ घंटे/2 किलोमीटर का सामान्‍य ट्रैक था, जाने कितनी किस्‍म के औषधीय गुणाों से भरपूर पेड़-पौधों वाला जंगल, जोंक-सांपों का जंगल, एक डाल से दूसरी पर फुदकते पक्षियों की चहचहाहट से गुलज़ार जंगल, घुमक्‍कड़ी की प्‍यास बुझाता जंगल।

Inside deep forest within Chaubatia Garden

ट्रैक पूरे कर हम गार्डन शॉप में थे जहां से जूस, स्‍क्‍वाश, चटनियों, मसालों, सुविनर, किताबों, पहाड़ी पौधों के बीजों को झोलों में भर लाए हैं।

Souvenirs from Uttarakhand – local themed fridge magnets, pickle Rhododendron juice

कुछ शॉपिंग हो जाए

Famous sweet from Uttarakhand – Bal Mithai

तीसरा दिन शहर में तफरीह के नाम रहा। सदर बाज़ार से बाल-मिठाई झोले में धरना मेरा एजेंडा नंबर वन था तो मां को पहाड़ी गहनों का चस्‍का लगा था। मां की खरीदारी के बहाने पारंपरिक पहाड़ी आभूषणों से रूबरू हुई थी इस ट्रिप में। फिर लौटते हुए, नरसिंह स्‍टेडियम पर निशानेबाजी करते युवाओं को देखना सुहाया था तो गोल्‍फकोर्स ने हमें उत्‍तराखंड के इस हिल स्‍टेशन को लेकर एक बार फिर इतराने का सबब दिया था। चौड़ी सड़क, धूप से नहाया आसमान, प्रेक्टिस करते सैनिक, सड़कों पर दौड़ लगाते युवा – पहाड़ का यह हिस्‍सा जीवंत था।

Sideview of Ranikhet Golf Course

यहां से 8 किलोमीटर दूर मजखाली रिज पर उस दिन का सूर्यास्‍त देखने जा पहुंचे थे। सड़क किनारे गुमटी से आलू के गुटके और कड़क पहाड़ी चाय की मिठास लिए उस अस्‍तांचल सूर्य की यादों को भर मैं लौट आयी हूं। मनोकामना पूर्ण होने तक, झूला देवी में घंटी बांधने की बेताबी लिए।

Ranikhet is a well maintained cantonment, keep it clean

Quick Facts 

रानीखेत: जिला अल्‍मोड़ा, उत्‍तराखंड

समुद्रतल से ऊंचाई: 1860 मी./ 6102 फुट

कब जाएं: मार्च से मई, सितंबर-नवंबर मौसम साफ, आसमान खुला-खुला रहता है, हिमालय के 180° दर्शन  का सबसे आदर्श समय

नवंबर-मार्च में कड़ा जाड़ा पड़ता है, स्‍नोफॉल भी होता है, अगर ठंड आपको हलकान नहीं करती तो सर्दियों में भी रानीखेत का रुख किया जा सकता है

जून-अगस्‍त: बारिश का मौसम, लिहाज़ा सफर पर निकलने से पहले मौसम और सड़कों का हाल अवश्‍य जान लें, बारिश में धुली-धुली सड़कें और नायाब कुदरती हरा रंग इन दिनों ही दिखता है

कुल-मिलाकर, रानीखेत पूरे सालभर स्‍वागत-सत्‍कार करने वाला हिल स्‍टेशन है

दिल्‍ली से दूरी- 350 किलोमीटर/9 घंटे

रूट:                 

 दिल्‍ली – पिलखुवा – गढ़मुक्‍तेश्‍वर – मुरादाबाद – काशीपुर – रामनगर – कालाढूंगी – काठगोदाम  – ज्‍योलिकोट – भवाली – गरम पानी – खैरना – रानीखेत  या

दिल्‍ली – पिलखुवा – गढ़मुक्‍तेश्‍वर – मुरादाबाद – टांडा – दड़ियाल – सुवार – बाजपुर – कालाढूंगी   – नैनीताल – भवाली – गरम पानी – खैरना – रानीखेत

आसपास

  • चिलियानौला: हैड़ाखान वाले बाबा का मंदिर, यहां हिमालयी श्रृंखलाओं के मनोरम दर्शन करें
  • चौबटिया बोटेनिकल गार्डन: रानीखेत छावनी से होते हुए, करीब 10 किलोमीटर दूर चौबटिया के फल-फूलों के बगीचों, बांज-बुरांस के जंगलों, जड़ी-बूटियों से पटी पगडंडियों और सेब, प्‍लम, अखरोट, बादाम, चेस्‍टनट के बगीचों के उस पार नंदा देवी, त्रिशूल, नंदा खाट, नंदा कोट, नंदा घुंटी जैसी पश्चिमी हिमालय की चोटियों के नज़़ारे जमा हैं। बगीचों की सैर और घने जंगल में ट्रैकिंग के अलावा यहां कैफे और ताजे फल, मसाले, हिमालयी शर्बतों-जूसों, जैम-चटनियों की दुनिया भी आबाद है। लौटते वक्‍त ताज़ा फलों के जूस आदि खरीदना न भूलें
  • केआरसी फैक्‍ट्री- ट्वीड और वूलन शॉल, कोट, वेस्‍टकोट, खेस-कंबल आदि की खरीद के लिए कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर की फैक्‍ट्री जाए
  • द्वाराहाट: रानीखेत से 33 किलोमीटर दूर, कुमाऊं-गढ़वाल को सीधे जोड़ने वाले रानीखेत—कर्णप्रयाग मार्ग से होते हुए जाया जा सकता है। रानीखेत से 1 दिन के लिए यहां जा सकते हैं।
  • कौसानी और बैजनाथ मंदिर समूह: दूरी 58 किलोमीटर/2.5 घंटे

रानीखेत और आसपास के ठिकानों पर केंद्रित 4 भागों की सीरीज़ में यह पहला भाग है। अगले भाग के लिए इस लिंक पर क्लिक करें –  Read more on getaways from Ranikhet

Kumaon Regimental Centre – wool factory 

 

 

 

2 Comments on “Ranikhet – a trip down memory lane”

  1. झूला देवी आपकी मनोकामना जल्दी पूर्ण करेगी, ऐसा विश्वास है।

  2. कोलेज के दीनो में वेकेशन हुआ नहि की हम ३ भाई अहमदाबाद से पहाड़ को चल देते थे । रेज़र्वेशन तो मिल नहि पता था २४ घाटे लगते थे दिल्ली पहुँचने में realway स्टेशन पर plateform पर ही नहा कर हल्द्वानी की बस पकड़ कर रात को ११।१२ बजे हल्द्वानी पहोचते थे । रात को बस स्टैंड पर सोते सुबह में रानीखेत की बस फिर द्वाराहाट और फिर २ घंटे चल कर गाँव पहोचते थे । कुछ दीन बाद मामा के घर बहनो के घर मोसी के घर चले जाते थे और सीमित पेसो में पहाड़ घूमते थे ।
    इनमे से बहोत सारी जगह देखी हुई हे ।पढ़ते हुए एसा लग रहा था की में ख़ुद भी दुबारा घूम रहा हु । कुछ जगह तो जानी पहेचानी हे पर अब तो आँखों के सामने तेर सी रही हे ।

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