Travelling back in time … to India of 19th century

4 Urdu books translated into English as City Of My Hearts by Rana Safvi
Review by a Hindi writer
लाल किले के परकोटे से हिंदुस्तान का दीदार 
दिल्ली क्या थी क्या हो गयी है ?  इस बारे में अगर जानना है तो चार किताबें ज़रूर पढ़िए — ‘दिल्ली का आख़िरी दीदार’  जिसे सैयद वज़ीर हसन दहलवी ने लिखा था,  मुंशी फैजुद्दीन की ‘बज्‍़म—ए—आखीर’,  अर्श तैमूरी की ‘किला—ए—मुअल्ला की झलकियां ‘और ख्वाजा हसन निज़ामी के किस्सों का संग्रह ‘बेग़मात के आंसू’। पहली तीन किताबें इस बात का बयान करती हैंं  कि आख़िरी दो मुग़ल शहंशाहों के ज़माने में लाल किले के भीतर क्या होता था जबकि बेग़मात के आँसू आपको उन दिनों की ओर ले जाती है कि कैसे जब मुग़ल शासक जब लाल क़िले से रुख्सत हुए थे तो किले के भीतर की रौनक दम तोड़ रही थी।
Inside Red Fort
हैरानी की बात ये है कि चारों ही किताबें अलग अलग दौर में लिखी होने के बावजूद एक दूसरे को पुष्ट करती हैं जो इस बात का सबूत है कि इनके बयान सच्चाई के नज़दीक है। लेकिन चारों ही किताबें उर्दू में हैं। फिर दिल्ली और लाल किले की असलियत का दीदार कैसे हो ?  जवाब राना सफवी की City Of My Heart है। इतिहासकार सफ़वी ने इन चारों किताबों को चुना उन पाठकों के लिए जो उर्दू जानते – समझते या फिर चार किताबें पढ़ने की कुव्वत नहीं रखते उनके लिए इनका तर्जुमा अंग्रेज़ी की पुस्तक में उतार दिया।  ‘सिटी ऑफ़ माई हार्ट’ इन चारों पुस्तकों को एक साथ लेकर आई है। यानी दिल्ली को जानने का रास्ता बेहद आसान हो गया।
आपको पता है जब बहादुर शाह ज़फ़र जब किला-ए-मुबारक, जिसे अब लाल किला के नाम से जाना जाता है, छोड़कर जा रहे थे तो उन्होंने अपनी बेटी कुलसूम  से क्या कहा था। अपना दर्द बयान करते हुए इस आखिरी मुगल शहंशाह ने कहा था –  ”हिन्दू और मुसलमान आबादी दोनों ही हिन्दुस्तान की मेरी औलादें है और इनकी हर मुसीबत की आवाज मुझे सुनाई दे जाती है। मेरी वजह से इन्हें तकलीफ मत होने देना। ” 16 सितंबर 1857 को बहादुर शाह जफ़र ने किला छोड़ दिया था। ज़फ़र जब तक लाल क़िले में रहे तब तक किले  के  मुसम्मन बुर्ज से रोज़ सुबह अपनी रियाया को दर्शन दिया करते थे और यह परंपरा झरोखा दर्शन कहलाती थी।  यमुना नदी के तट पर स्नान के लिए आए हिंदू और सुबह-सवेरे यमुना रेती से गुजरने वाले मुसलमान नमाजी यहीं से शहंशाह का दीदार किया करते थे। ये रिवायत अकबर ने शुरू की थी जो ज़फ़र ने जारी रखी। कौमी एकता के ये धागे और इनसे बुना गया ताना-बाना City Of My Heart में समाया हुआ है ।
View of Diwan-e-Khas inside Red Fort
ऐसे अनेक क़िस्से हैं जो इस किताब के पहले पन्ने से लेकर आख़िर तक में संजोए गए हैं और इतिहास को जैसे एक किस्सागो ने अंग्रेज़ी में सुनाया है। मसलन, जब मुगल शासक और उनके परिवार के लोग लाल क़िला छोड़कर निकल रहे थे तो उस समय का माहौल कैसा रहा होगा यह बेगमात के आंसू  पढ़कर आसानी से समझ आता है। एक बेगम थीं अघाई बेगम। वो लाल क़िले की शाही औरतों की अटेंडेंट हुआ करती थी । उन्होंने इस किताब में उस समय की गवाही दी है कि किस तरह शाहजादों की आमदनी कम होती गई कैसे वे शहज़ादे कर्ज़दार होते गए। दौलत से महरूम  इन मुगलों को सेठ चूनामल कर्ज दिया करते थे। इन सेठ चूनामल की हवेली आज भी चांदनी चौक में खड़ी है।
View of Naubat Khana from Diwan-e-Aam
और किले के भीतर साजिशों के राज भी तो दफन होंगे। सत्ता और उस पर कब्जे की मुहिम चली होंगी, दरबारियों के बीच प्रपंज रचे गए होंगे। इन सब का बयान करती है किला-ए-मुअल्ला की झलकियां। दरअसल सिटी ऑफ़ हार्ट्स पढ़ते हुए महसूस होता है कि यह उर्दू से किया गया तर्जुमा नहीं बल्कि इन साजिशों और किरदारों को गोया सफ़वी ने लाल क़िले में घूम घूमकर खोजा है। किले की कहानियां, वो माहौल, वो दस्तरख्वान, वो दीवाने आम, दीवाने खास, वहां की गुफ्तगू, फरियादी और उनकी फरियाद …. लगता है सब जैसे राणा सफवी की आंखों के सामने से होकर गुजरा है।
Diwan-e-Aam
सफ़वी कहती है कि दिल्ली पर अंग्रेज़ों का राज आने, बहादुरशाह जफर के गिरफ़्तार होने और आख़िरकार लाल क़िले से मुगलों की विदाई होने के साथ ही वह गंगा-जमुनी तहजीब ख़त्म होती गई जो लाल किले में बसा करती थी।
Hayat Baksh Bagh and view of old British era buildings inside Red Fort
उस लाल क़िले में जहाँ ईद उल फित्र , नवरोज़, बारावफात, रक्षाबंधन, जिसे सलोना सलोना कहते थे, और दशहरा सब मनाए जाते थे। होली और दिवाली भी होती थी। हिन्दू, मुसलमान और शहंशाह के साथ उनके आला दरबारी इन सभी त्योहारों में शरीक होते थे। दास्तानगो जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर किस्से सुनाते थे। लेकिन लाल क़िले पर ब्रिटिश राज कायम होने और  ज़फ़र को रंगून रवाना किए जाने के बाद गायब होता गया।  हिंदू और मुसलमान में तलवारें खींच गईं। बागी सिपाहियों को पकड़ लिया गया। कुछ शाहजहानाबाद छोड़कर चले गए और जिंदा रह गए। बाक़ी का क़त्लेआम कर दिया गया। कोतवाली चबूतरा जहां आज सीसगंज गुरद्वरा है, वहां बड़े पैमाने पर लोगों को एक साथ फांसी पर लटकाया गया। इस तरह से लाल क़िले के भीतर की गंगा जमुनी तहजीब का गला घोंट दिया गया।
उर्दू से अंग्रेज़ी में ट्रांसलेशन का राना का हुनर देखते ही बनता है। इससे पहले भी तो वह कई किताबें उर्दू से अंग्रेज़ी में ला चुकी हैं।  उन्होंने दिल्ली के मकबरों और इमारतों पर लिखी गईं सर सैयद अहमद ख़ान की पुस्तक के दोनो एडिशंस का तर्जुमा किया। वह टेल्स फ्रॉम कुरआन एंड हदीथ, व्हेयर स्टोंस स्पीक, हिस्टोरिकल ट्रेल्स इन महरौली, द फर्स्‍ट सिटी आफ दिल्ली, द फॉरगॉटन सिटीज़ आफ दिल्ली जैसी पुस्तकें लिख चुकी हैं जो काफ़ी चर्चित हुईं। ‘हज़रत-ए-दिल्ली’ नाम से उनका मशहूर ब्लॉग है।
Heritage walk in Rad Fort led by Rana Safvi
और इस किताब को उसकी पृष्ठभूमि में बखूबी समझने के लिए हमने यानी Travel Correspondents and Bloggers ने प्रकाशक  के साथ मिलकर 12 जनवरी, 2019 को लाल किले में विरासत की सैर की …. राना सफ़वी की उंगली पकड़कर। किताब को पढ़ने-समझने के लिए यह अंदाज़ सभी को पसंद आया।
Rana signing copies for participants after the walk at Red Fort
इस हेरिटेज वॉक में शामिल हुए थे दिल्ली के कई पत्रकार, ब्लॉगर, लेखक, फोटोग्राफर वगैरह। ट्रैवल राइटर्स और ब्लॉगर्स के हमारे ग्रुप Travel Correspondents and Bloggers Group ने इस हेरिटेज वॉक को आसान बनाया।
Quick facts about  City Of My Hearts
Language: English (translated and based on 4 Urdu books)
Publisher: hachette India (https://www.hachetteindia.com/)
Price: ₹499
Genre: Non fiction

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *