Why ‘Women’s exclusive’ tag does not appeal to the nomad in me!

औरतों के लिए होटल — कभी नहीं!

मेरे-आपके अपने शहर में एक बड़ी होटल चेन OYO Rooms ने मेरी बिरादरी के लिए ‘विमेन्स एक्सक्लुसिव’ होटल {OYO WE (Women’s Exclusive) Gurgaon} खोलने का ऐलान किया है। खुश होना चाहिए न हम औरतों को कि हमारे लिए एक ऐसा पुख्ता इंतज़ाम अब हो गया है जहां हम सुकून से ठहर सकती हैं, सुरक्षित महसूस कर सकती हैं और बेखौफ होटल में यहां से वहां जा सकती हैं?

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सच कहूं, इस खबर से मुझे निराशा हुई। बेशक, अकेले सफर में रहने वाली मुझ जैसी औरतों को तो खुश होना चाहिए। हमारी आज़ाद ख्याली के सिवाय समाज में बदला ही क्या है? सड़कों पर अंधेरा घिरते ही सिर्फ आदमी नज़र आते हैं, बसों में, रेलों में, लोकल में, दुकानों पर, खोमचों पर, स्टेशन पर, प्लेटफार्म पर सभी जगह ज्यादा तो वही दिखते हैं। हम नौकरी के लिए, काम के लिए, मजदूरी या सौदा—पत्ता करने के लिए और अब इधर घुमक्कड़ी के लिए घरों को जरूर लांघने लगी हैं लेकिन उससे ज़मीनी हालत तो नहीं बदल जाते। खबरों में बलात्कार, औरतों से छेड़छाड़, दफ्तरों में यौन-शोषण, सड़कों पर फब्तियां … कुछ भी तो नहीं बदला। असल में यौनाचार बढ़ता ही गया है बीते सालों में। लेकिन इस सच को जानते हुए भी मैं ऐसे होटल का स्वागत नहीं कर सकती और उसमें ठहर तो कतई नहीं सकती जो ‘विमेन्स ओनली’ की बुनियाद पर टिका हो।

समाज में अपने लिए कटघरे खड़े होने पर भला मैं खुश कैसे हो सकती हूं?

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आए दिन हम सुनते हैं ‘ईव्स टैक्सी’, ‘विमेन्स स्पेशल कोच’, ‘महिला कोटा’, ‘महिला आरक्षण’ और अब ​सिर्फ औरतों के लिए होटल। मैट्रो की सवारी के वक़्त भी जिसे ‘महिला स्पेशल’ डिब्बे में घुसने में कोफ्त होती हो, वो भला ऐसे किसी होटल में ठहरने के बारे में कैसे सोच सकती है जहां सिर्फ और सिर्फ महिलाएं ठहर सकती हैं। आपको लग सकता है कि ऐसी व्यवस्थाएं हम औरतों को ज्यादा सुकून देती हैं, लेकिन मुझे इनसे कोफ्त होती है। इनसे मुझे अपने लिए सुविधा की नहीं बल्कि इस बात की गंध आती है कि जो समाज हमारी सुरक्षा का इंतज़ाम नहीं कर पाया वो अब हमारे इर्द-गिर्द दीवारें खड़ी कर हमें सुरक्षा का आभास देना चाह रहा है।

एक और राज़ की बात बोलूं। मैं जब अकेले रेलगाड़ियों में सफर करती हूं तो भी विमेन्स कोच या लेडीज़ कोटा बुक नहीं करती। कहा न, कोफ्त होती है अपनी घेरेबंदी पर। मैट्रो स्टेशन पर उस गुलाबी तीर के आसपास भी नहीं फटकती हूं जिस पर दर्ज होता है केवल महिलाएं

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मुझे जनरल डिब्बा ही रास आता है, क्योंकि वहां मुझे अपना समाज दिखाई देता है जिसमें मेरी जैसी औरतें होती हैं और पुरुष भी होते हैं। वहां संतुलन होता है और यह अहसास तारी नहीं हो पाता कि मेरे लिए कुछ अलग इंतज़ाम किया गया है। हो सकता है इसके पीछे मेरे को-एड स्कूली पढ़ाई के वो दिन रहे हों जब सिर्फ ‘कन्या विद्यालयों’ के दौर में भी हम लड़कों के साथ पढ़े थे। या फिर नौकरी का वो दौर जब लेट नाइट मीटिंगों में पुरुषों के बीच अपने अकेले होने का अहसास कभी हावी नहीं होता था। क्योंकि वहां खुद को असली पेशेवर साबित करने की धुन सवार रहती थी, अपने आपको औरत होने का तमगा दिलाकर जल्दी सरक लेने की जिद नहीं।

अब इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम अपने माहौल की असलियत से वाकिफ नहीं। हमें अपनी उस सच्चाई से कभी इंकार नहीं रहा है कि यहां देर शाम सड़कों पर अकेले गुज़रना असहज बनाने के लिए काफी होता है। कि अंधेरे में ही नहीं दिन की रोशनी में भी अकेले टैक्सियों की सवारी हमें चौकस ही रखती है। और यह भी कि आधी रात को एयरपोर्ट से घर की टैक्सी पकड़ते वक़्त कैसा-कैसा होता है मन! और वो जो उस वक़्त हम अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन में सिर घुसाए रखते हैं वो सोशल मीडिया का नशा नहीं होता बल्कि उन संदेशों का आदान—प्रदान होता है जिन्हें साइबर संसार में भेजते रहते हैं, अपनी लोकेशन को अपडेट करने के लिए!

जब सफर में अकेली होती हूं, तो यकीनन ज्यादा सतर्क रहती हूं। खतरे मोल नहीं लेती, एडवेंचरस दिखने की चाहत नहीं पालती, ज्यादा सलीके से कपड़े पहनती हूं, अजनबी शहर की अजनबी गलियों में रात—बे रात नहीं निकल जाती .. कुछ भी साबित नहीं करना होता मुझे। बस खुद पर ज्यादा यकीन रखती हूं। उस यकीन को बनाए रखने के लिए ज्यादा सावधान रहती हूं। अपने पर ऐतबार टूटना नहीं चाहिए, इसके लिए हर वो कोशिश करती हूं जिसे बचपन से अब तक घुट्टी की तरह पीती आयी हूं। और यह सब तभी करती हूं जब घर से, अपने शहर से या अपने देश-समाज से बाहर होती हूं। अजनबी संसार में उतरने पर ही तो अपनी तालीम की परख हो पाती है .. यानी घर से निकलना जरूरी है, संसार को जानने-जीने के लिए। अपनी सुरक्षा का भरपूर ख्याल रखते हुए नए अनुभव-अहसास लेना भी जरूरी है, लेकिन उसके लिए मुझे ‘नॉर्मल’ होटल में ठहरना अच्छा लगता है न कि ‘विमेन्स एक्सक्लुसिव’ में!

बस इसीलिए स्वागत नहीं कर पायी उस होटल का जो सहूलियत और सुरक्षा के वायदे के साथ  हम औरतों के लिए खुला है .. ताज़ा-ताज़ा!

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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