Off Beat Summer Destinations in India

गर्मियों में इस बार चलें कहीं और

पुराने हिल स्टेशन अब घिसेपिटे कहलाने लगे तो नए दौर के पर्यटकों ने अपनी फितरत के हिसाब से कुछ नए स्थलों की तलाश की है। युवाओं के कदम कुछ नई मंजिलों की तरफ बढ़ चले हैं। ऐसे ही कुछ नए, आॅफबीट समर डेस्टिनेशंस यानी गर्मियों में नए पसंदीदा ठिकानों की जानकारी

इस बार  आपके लिए 

गर्मियों की आहट होते ही घबराहट होना लाज़िम है। यह हाल हम हिंदुस्तानियों का है तो अंग्रेज़ों की हालत क्या होती है, सहज ही इसकी कल्पना की जा सकती है। उत्तर भारत के विशाल मैदानी इलाके जब गर्मियों में उबलने लगते होंगे तभी शायद अंग्रेज़ों ने पर्वतीय क्षेत्रों का रुख किया होगा। हिल स्टेशनों की उनकी खोज ने हमें शिमला, नैनीताल, मसूरी, माथेरन, श्रीनगर, कोडइकनाल जैसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय शहर सौंपे जहां बीते सालों में सैलानियों के जत्थे के जत्थे उमड़ते देखे गए हैं। और धीरे-धीरे बढ़ती भीड़ तथा  इन शहरों की फैलती आबादी ने इन शहरों के सुविधा तंत्र पर लगातार अपनी जकड़न बढ़ायी है।

और इन परेशानियों से बचने के लिए, छुट्टियों का भरपूर लुत्फ उठाने के इरादे से लोगों ने नए ठौर-ठिकानों को तलाशना शुरू किया। नैनीताल से कन्नी काटने वाले सैलानी रामगढ़, भीमताल, मुक्तेश्वर, भुवाली, बिनसर और उससे भी आगे अल्मोड़ा, रानीखेत, मुन्सियारी की तरफ बढ़ गए।

चलें वाटा की सैर पर या चिकमगलूर या कुर्ग के कॉफी बागानों तक

सिर्फ उत्तर भारत ही गर्मियों में ठंडक देने वाले ठिकानों में शुमार हो, ऐसा नहीं है। मई-जून में दक्षिण भारत में भी हिल स्टेशनों का मज़ा लिया जा सकता है और अगर थोड़ी मेहनत की जाए तो कुछ ऐसी जगहों को तलाशना भी मुमकिन है जो अभी घुमक्कड़ों की नज़रों से महफूज़ हैं।

वाटाकनाल यानी वाटा को स्थानीय लोग ‘इस्राइली गांव’ भी कहने लगे हैं और ऐसा वहां अक्टूबर के बाद बड़ी तादाद में पहुंचने वाले इस्राइली सैलानियों के चलते हुआ है। तमिलनाडु के डिंडिगुल जिले में पालनी की पहाड़ियों के धुर दक्षिण में बसे वाटा ने आम टूरिस्टों से दूरी बनाकर रखी है। इसके आसपास स्थित कोडइकनाल, कोयंबतूर और उटी जैसे हिल स्टेशन कभी के पुराने पड़ चुके हैं लेकिन दुनिया के 25 बेहतरीन बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के तौर पर पहचान बना चुके पश्चिमी घाटों के पूर्वी मुहाने पर ​बसे वाटा की ताज़गी आपको यकीनन ताज़ादम कर देगी। वाटा की वादियों में बादलों की शैतानियां हैं तो फूलों-वनस्पतियों का आकर्षण भी कम नहीं। गांव के बाशिन्दों की आमदनी का जरिया सैलानी ही हैं, लिहाजा वे आपके लिए सुविधा जुटाने में कोई कोर-कसर नहीं रख छोड़ते।

कैसे पहुंचे — कोयंबतूर या मदुरई नज़दीकी रेल लिंक हैं, जहां से टैक्सी से एनएच209 पर बढ़ते हुए पालनी हिल्स होते हुए वाटा पहुंचा जा सकता है।

चिकमगलूर में मीलों तक फैले कॉफी के हरे-भरे बागानों, बीते वक़्त के किस्सों का खामोशी से बयान करते ऐतिहासिक खंडहरों और समृद्ध दौर की परंपराओं को समेटे मंदिरों से मिलने इस बार कॉफी कंट्री चले आइये। कहते हैं भारत में सबसे पहले कॉफी की खेती कर्नाटक के चिकमगलूर जिले में ही शुरू हुई थी। चिकमगलूर की पहाड़ियां पश्चिमी घाट का ही हिस्सा है और तुंग तथा भद्रा नदियों का सफर भी यहीं शुरू होता है। यहां आपको लग्ज़री होटलों से लेकर स्टार और बजट होटल आसानी से मिल जाएंगे। यों तो यहां आने का सबसे अच्छा मौसम सितंबर से अप्रैल तक है लेकिन बारिश के मस्त नज़ारों, झरनों और मानसूनी फुहारों में भीगने का मन हो तो मई—अगस्त तक के महीने चुनें।

कैसे पहुंचे — हवाई मार्ग से मंगलोर, बेंगलुरु और हुबली नज़दीकी एयरपोर्ट हैं, मंगलोर 160 किलोमीटर की दूरी पर सबसे नज़दीकी हवाईअड्डा है। रेल मार्ग से आने के लिए मंगलेार, बेंगलुरु, हासन रेलवे स्टेशनों तक पहुंचा जा सकता है, और आगे के सफर के लिए टैक्सी लेने में ही समझदारी है।

कुर्ग भी दक्षिण भारत में तेजी से लोकप्रिय बनती जा रही मंजिलों में से एक है। कोलाहल से दूर बसे कुर्ग में बहुत कुछ ऐसा है जो आपको कुदरत की नरमाहट का अहसास कराता है। ज़माना और वक़्त है कुछ अलग करने का और अलग भी कुछ अलग अंदाज़ में करने का! चाय  बागानों की सैर अब पुरानी बात हुई, आप सैर कर आइये कॉफी प्लांटेशन की। कर्नाटक में आईटी हब बेंगलुरु से कुर्ग का सफर 5 घंटे में पूरा होता है और आप पहुंच जाते हैं धुंध से ढके कॉफी बागानों में।

चाय के बागानों से वाकफियत अब कोई बहुत दुर्लभ नहीं रह गई है, लेकिन कॉफी बीन्स का बागान से आपके कप तक का सफर वाकई दिलचस्प होगा। ‘बीन टू कप’ प्लांटेशन गाइडेड टूर चुनें और कॉफी के साथ अपनी दोस्ती निभाएं। नज़दीक ही इरपु जलप्रपात है, तीर्थस्थल तालकावेरी है और शहरी शोरशराबे से दूर बौद्ध नगरी बायलाकुपे भी है।

 कैसे पहुंचे — बेंगलुरु से कुर्ग तक करीब 255 किलोमीटर का सफर कैब से पूरा किया जा सकता है। मंगलोर में नज़दीकी हवाईअड्डा है जो 135 किलोमीटर दूर है। आप रेल से यहां पहुंचने के लिए हासन, बेंगलुरु, मंगलोर या सबसे नज़दीक मैसूर स्टेशन 120 किलोमीटर तक आ सकते हैं।

 सिक्किम से शिलॉन्ग तक

नॉर्थ ईस्ट के यकीनन सबसे खूबसूरत राज्यों में से एक है सिक्किम। इसलिए नहीं कि वहां सरकारी स्वच्छता अभियान जोर-शोर से चलता है, बल्कि इसलिए कि लोगों को अपने शहर से प्यार है, उस पर फख्र है। राजधानी गंगटोक में सार्वजनिक दीवारों पर सजी ग्राफिति, ट्रैफिक से लेकर साफ-सफाई तक, पब्लिक स्पेस पर तमीज़ से लेकर शहरभर में सज-धजकर दौड़ने वाली टैक्सियों को देखकर ‘कल्चरल शॉक’ जैसा अहसास होता है। गंगटोक की सड़कों पर बसें कम टैक्सियां ज्यादा हैं और हर टैक्सी ड्राइवर फुटबॉल प्रेमी है, कोई आर्सनल का दीवाना तो कोई चेल्सी का फैन, किसी ने युनाइटेड मैनचेस्टर को दिल दे रखा था तो अगला टैक्सी ड्राइवर लिवरपूल प्रशंसक था। इस शहर में आकर आप जिंदादिली के अहसास से खुद को लबरेज़ पाते हैं। और उत्तर या दक्षिण सिक्किम के सफर में निकलने पर आपको कुदरत के अद्भुत नज़ारों के अलावा प्राचीन बौद्ध मठ, भोटिया-लेपचा आदिवासी जनजीवन की झांकियां, दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंगा के दर्शन के अलावा और भी ऐसा बहुत कुछ मिलता है जो बार-बार इस तरफ लौटने के लिए आपको प्रेरित करेगा।

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Street Art, Gangtok

कैसे पहुंचे — सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) है जहां से राजधानी गंगटोक की 120 किलोमीटर की दूरी प्राइवेट टैक्सी से करीब 4 घंटे में या राज्य परिवहन की बसों से नापी जा सकती है। नज़दीक हवाईअड्डा सिलीगुड़ी से 12 किलोमीटर दूर बागडोगरा है।

नॉर्थ ईस्ट का ही एक और खूबसूरत राज्य है मेघालय जो पर्यटकों को भा रहा है। राजधानी शिलॉन्ग में उमियम झील में बोटिंग हो या जीवित जड़ों से बुने पुलों को देखना हो तो मेघालय आना बनता है। और चेरापूंजी का आकर्षण भी कुछ कम है क्या ? यों अब चेरापूंजी में सबसे ज्यादा बारिश नहीं होती, नज़दीकी मॉसिनराम के माथे पर यह ताज अब सज चुका है तो भी चेरापूंजी का बरसों पुराना रोमांस आज भी कायम है। और फिर फेसबुक चेक-इन के लिए भी यह बढ़िया ठिकाना है! यकीन न हो तो इस बार आजमा लो ..

कैसे पहुंचे — नजदीकी रेलवे स्टेशन/हवाईअड्डा गोवाहाटी है जहां से एनएच 40 होते हुए शिलॉन्ग तक की 122 किलोमीटर की दूरी आसानी से टैक्सी/बस से नापी जा सकती है।

उत्तराखंड से लेकर हिमाचल तक

दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में आना-जाना चुटकी बजाने जितना आसान नहीं होता। लंबी यात्राओं के लिए लंबी तैयारियों की दरकार होती है। पहले से बुकिंग, नई जगहों की पड़ताल और फिर जेब के लिहाज से भी तैयारी जरूरी है। लेकिन अगर आपने घुमक्कड़ी का इरादा आखिरी समय में बनाया है, या एडवांस में एयर/रेल बुकिंग करने से चूक गए हों तो यह मत समझें कि आपके पास अच्छी मंजिलों के सैर-सपाटे के विकल्प नहीं बचे हैं। ज़रा अपने बैकयार्ड में झांके, उत्तर भारत में बहुत कुछ अब भी बाकी है जो अनछुआ-अनदेखा न सही मगर दिलचस्प है। उत्तराखंड से लेकर हिमाचल तक में आज भी कई ऐसे इलाके हैं जिन्हें बीते सालों में पर्यटकों ने खंगाला ही नहीं, कुछ खास की तलाश करने वाले गिने-चुने सैलानी ही इन मंजिलों तक गए हैं। और ऐसे में इनका आकर्षण बरकरार है।

उत्तराखंड में इधर कुछ समय से देहरादून से आगे चकराता, अल्मोड़ा में बिनसर, पिथौरागढ़ में मुन्सियारी तो गढ़वाल में औली, चोप्ता जैसे ठिकाने सैलानियों के एजेंडा में शामिल होने लगे हैं। कार्पोरेट कल्चर में भागती-दौड़ती जीवनचर्या बिताने वाले युवाओं को शहरों से शॉर्ट ब्रेक दिलाने वाली इन मंजिलों तक 5 से 10 घंटों में पहुंचा जा सकता है। मसूरी और शिमला की तरह ये ठिकाने न तो ट्रफिक जाम से जूझते हैं और न पानी की किल्लत के चलते सैलानियों का मज़ा किरकिरा करते हैं। मानसिक सुकून, सुविधा और शांत-सुरम्य ये पहाड़ी प्रदेश उनके लिए हैं जिन्हें कुछ समय के लिए रोज़मर्रा की चिक-चिक से दूर जाना होता है। पहाड़ों का मौसम जहां राहत देता है वहीं सादगी पसंद स्थानीय लोगों की मौजूदगी भी आश्वस्त करती है कि आप सुरक्षित हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड जैसे राज्य आज सोलो विमेन ट्रैवलर्स की सूची में तेजी से जुड़ रहे हैं।

गर्मियों में उत्तराखंड में एडवेंचर

कुमाउं और गढ़वाल की हिमालयी चोटियों पर बीते महीनों से जमा बर्फ भी गर्मियों की आहट सुनकर पिघलने लगी है। पहाड़ों की ढलानों पर जमा बर्फ के सरकने के बाद घास और फूलों के पौधे उगने लगे हैं। यही समय है जब एडवेंचर प्रेमी ट्रैकिंग पर निकलते हैं। मानसून से पहले के कुछेक महीने आपको हिमालयी क्षेत्रों को नज़दीक से देखने-जानने का भरपूर मौका देते हैं। कुमाउं में पिंडारी, कफनी, सुंदरढूंगा ग्लेश्यिरों पर ट्रैकिंग का अपना अलग ही मज़ा है। अल्मोड़ा से 90 किलोमीटर दूर गोमती तथा सरयू के संगम पर बसे बागेश्वर जिले को आधार बनाकर ये ट्रैक किए जा सकते हैं। कुदरत को नज़दीक से निहारना हो या बर्ड वॉचिंग करनी हो तो निश्चिंत होकर उत्तराखंड को चुना जा सकता है। अलबत्ता, यहां कुछ इलाके भूस्खलन वाले हैं इसलिए सावधानीपूर्वक इन क्षेत्रों को पार करें। टूर/ट्रैक आॅपरेटर का चुनाव सोच-समझकर करें।

 उधर, गढ़वाल में उत्तरकाशी को बेस बनाकर डोडीताल, यमुनोत्री-गंगोत्री-गोमुख तक की ट्रैकिंग की जा सकती है। इसी तरह, जोशीमठ को बेस चुनकर चोप्ता, कुआरी पास, नंदा देवी आल्पाइन ट्रैक पर एडवेंचर की खुराक ली जा सकती है। गढ़वाल के हिमालयी क्षेत्र मलारी ग्लेशियर, हर की दून, रूपकुंड, लाटा पंवाली केदारनाथ ट्रैक, पंच केदार ट्रैक जैसे ढेरों विकल्प उपलब्ध कराते हैं।

 नैनीताल के आसपास मुक्तेश्वर, भवाली, पंगोट जैसे क्षेत्र बर्ड वॉचिंग के लिहाज से मशहूर हैं। यहां दो से चार दिनों के मिनी ब्रेक आपको तरोताज़ा कर देंगे।

 हिमाचल में कसोलशिमला और कुल्लूमनाली से आगे भी है जहां!

हिंदुस्तान में पर्यटन ज्यादातर एल.टी.सी. और दुकानदार-बिज़नेसमैन आधारित रहा है, ऐसे में आसान मंजिलों को तो टूरिस्ट मानचित्र में जगह मिलती रही हैं लेकिन राज्य के दूरदराज के ट्राइबल इलाकों में टूरिस्ट आमतौर पर नहीं जाते। लाहौल-स्पीति या चंबा जिले में भरमौर तथा पांगी जैसे नाम बहुत कम सुनाई देते हैं। लेकिन ये इलाके सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध हैं। बर्फबारी की वजह से साल में ज्यादातर समय देश के दूसरे भागों से कटे होने की वजह से ये क्षेत्र सैलानियों की पहुंच से बाहर रहे हैं। इसी तरह, कांगड़ा में दूरदराज के इलाके छोटा भंगाल और बड़ा भंगाल जैसे इलाके हैं जहां जाना तो दूर इनके नाम तक सैलानियों की जुबान पर नहीं पहुंचे हैं। संस्कृति, भाषा-बोली, टोपोग्राफी, परंपरा के लिहाज से एकदम अलग ऐसा ही एक और ठिकाना शिमला जिले की सब-डिवीज़न डोडरा-क्वार है। बेशक, यहां तक पहुंचना साल के ज्यादातर महीनों में मुश्किल होता है, लेकिन गर्मी में बर्फ पिघलने के बाद मई से जुलाई तक के महीनों में यहां के प्राकृतिक दृश्यों को देखना आपको अलग अनुभव देगा। डोडरा-क्वार तक पहुंचाने वाली सड़क खस्ताहाल सही मगर वहां पहुंचकर आपको जो हासिल होगा वो सचमुच कुछ अलग, कुछ खास होगा। उधर, राज्य के कुल्लू जिले में मनाली से आगे मलाणा गांव दुनिया के सबसे पुराने जनतंत्र के रूप में आज भी अपनी हस्ती बनाए हुए है। यहां आज भी देवता के नाम पर शासन चलता है। कहते हैं यूनानी सिकंदर की फौज के लोग वहां बस गए थे, उन्हीं के वंशज आज भी यहां रहते हैं। मलाणा की स्थानीय बोली में यूनानी शब्दों की घालमेल इस ऐतिहासिक संपर्क के राज खोलती है। जल्द ही मलाणा तक पहुंचने वाला मार्ग भी सैलानियों के लिए खुल जाएगा और तब आप हिमाचल के कुछ अनदेखे या कम देखे-जाने इलाकों की सैर पर निकल सकते हैं।

क्यों न गर्मियों में इस बार लद्दाख-कश्मीर या कुल्लू-मनाली, डलहौजी और नैनीताल-मसूरी से आगे चला जाए!

One Comment on “Off Beat Summer Destinations in India”

  1. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा,आपकी रचना बहुत अच्छी और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिश करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग http://www.gyanipandit.com पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें

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