Thinking of travelling Solo? Go ahead …

महफूज़ होती हूं अनजानी राहों पर ..

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औली से जोशीमठ पहुंची थी एकदम अकेली। बिल्कुल सुनसान राहों पर, एक अनजान ड्राइवर के साथ पूरे पैंतालीस मिनट के सफर के बाद एकदम महफूज़ थी। और एक राज़ की बात कहूं, मेरे पर्स में पैपर स्प्रे भी नहीं था। सच कहूं, कभी नहीं रखती, कभी जरूरत भी नहीं होती। क्योंकि इस स्प्रे-शप्रे की जरूरत चकाचौंध वाले महानगरों में होती है और मैं ठहरी बस्तर, जगदलपुर, कोहिमा, मौसिनराम, चेरापूंजी से लेकर उत्तराखंड के किसी अनजान, अबूझे से कस्बे में आवारा फिरने वाली ! वहां इसका क्या काम !

उस रोज़ जोशीमठ से हरिद्वार तक का करीब 300 किलोमीटर का रास्ता तय करना था।

सोलो ट्रैवलर जैसा ग्लैमरस खिताब मुझे पसंद नहीं है, बस हालात थे उस रोज़ कि उत्तराखंड से दिल्ली तक के सफर में सिर्फ अपने साथ थी। शेयर्ड जीप की सवारी चुनी थी मैंने जिसमें मेरे सिवाय छह और पुरुष सवार थे और एक ड्राइवर, वो भी पुरुष। यानी एक औरत और सात पुरुषों का निहायत भारी असंतुलन उस सवा चार बाय दो मीटर के स्पेस पर हावी था।

सफर शुरू होने से पहले ही मेरे शहरी आतंकित मन ने अपनी जुगाड़बाजी शुरू कर दी थी। घर फोन घुमाया, बताया कैसे, कहां से, किसके साथ, किस रूट पर आगे का सफर होगा। वो संदेश फोन के दूसरी तरफ वाले के लिए कम, उस जीप के सह-सवारों के लिए ज्यादा था! फिर शुरू हुए संदेशों के सिलसिले, व्हट्सएप के सहारे हर छोटे-बड़े शहर-कस्बे, दरिया-पुल के नाम तैरने लगे थे। अपनी हर मंजिल को अपडेट करती जा रही थी, मानो हर ताजातरीन सूचना दर्ज करने के बाद सैन्ड बटन दबाते ही एक और सुरक्षा की परत मेरे तन पर बढ़ रही हो !

उधर, खबर कानों में घुल रही थी कि मेरी दिल्ली में वो सरकार बन रही है जिसने विमेन्स सिक्योरिटी के नारे के सहारे भी कुछ वोट जीते हैं। वो हमारे लिए सीसीटीवी और बसों में गार्ड का बंदोबस्त करने जा रही है। अजब सफर था वो, सुरक्षा के वायदों और असुरक्षा के अहसासों के बीच आगे बढ़ता हुआ ….

खैर, इतनी भारी भूमिका का कारण जानेंगे तो चौंक जाएंगे। उत्तराखंड में दौड़ते उस पहाड़ी हाइवे पर कुछ देर में नींद से पलकें भारी होने लगी थीं। लेकिन मेरी बरसों की ट्रेनिंग ने याद दिलाया  कि अकेले होने पर यों सो जाना नहीं होता, फिर उबर कैब का हादसा कौन मुआं भूला है अभी!

नींद से लड़ने की मशक्कत जारी थी। और तभी जीप ने ब्रेक लगाया, टी ब्रेक का ऐलान हुआ और सारे यात्री बाहर। मुझे भी खुली हवा में सांस लेना और उस ब्रेक को भुना लेना रास आया। चाय और मैगी की भाप के बीच संकोच के कुछ बादल छंटने लगे थे। मैं पहली बार उनसे मुखातिब थे। वो भी खुल रहे थे। धीरे-धीरे ही सही संवाद के सेतु मेरे और उनके बीच तैयार हुए। इस बीच, मन से फिर एक चेतावनी आयी – ज़रा संभलो, ज़रा ख्याल रखो अपना। यह चेतावनी ठीक वैसी लगी मुझे जैसे अक्सर एशियाई देशों में टूरिस्ट सीज़न के चालू होने के समानांतर अमरीकी और यूरोपीय सरकारें अपने घुमक्कड़ बाशिन्दों के लिए जारी करती थीं। इस्लामाबाद में फटे किसी बम के डर का असर कश्मीर जाने वाले सैलानियों को डराने के लिए … इंडोनेशिया में फैली किसी महामारी की आड़ में वियतनाम-थाइलैंड तक के पर्यटकों को चौंकाने के लिए …

अभी आगे पूरे आठ घंटे का सफर बाकी था, घुमावदार हाइवे पर कहीं बाजार-बस्तियां थीं तो कभी दूर-दूर तक सिर्फ जंगलों-नदियों-नालों का साथ था। इंसानी सभ्यता से मीलों के फासलों पर दौड़ती उस जीप में एक मैं और एक मेरा अकेला मन था जो अब धीरे-धीरे ही सही आश्वस्त हो रहा था। हनी सिंह की बदौलत! चौंक गए? किशोर कुमार और मौहम्मद रफी नहीं सुनती न ये पीढ़ी, सिर्फ हनी सिंह बजाती है। एक-एक कर जाने कितने वाहियात गाने बीतते रहे। ड्राइवर के बराबर में बैठे सरदारी जी की चालाकी मैंने ताड़ ली थी। जैसे ही कोई बेहूदा किस्म का गाना शुरू होता वो धीरे से कोई पुर्जा ऐसा घुमाते कि नई धुन बजने लगती। शुरू में मुझे इसका कारण समझ में नहीं आया था लेकिन जब तीसरी बार यही हुआ तो मन ही मन मुस्कुराए बिना नहीं रही थी। अब बिगाड़ो हनी सिंह उस जीप का माहौल। मेरा सैंसर बोर्ड बेहद अलर्ट था!

उस रोज़ जाना कि एक संजीदा मन बस अप्पन के ही पास नहीं है, कई दूसरे भी हैं जो इस पर कॉपीराइट रखते हैं!

और अगले कई मील, कई फासले, कई मोड़ और जाने कितने ही रास्ते मेरे इस अहसास को पुख्ता करते चले गए कि बहुत ही महफूज़ थी मैं उस रोज़। उन बियाबानों में खतरे से बाहर थी, अनजानी सड़कों पर अकेली होकर भी अकेली नहीं थी। आखिरकार मंजिल भी आ गई। हरिद्वार स्टेशन के बाहर उतर चुकी थी, मेरी गाड़ी पूरे तीन घंटे बाद थी और उन सरदार जी की चार घंटे बाद। मैं अपना किराया चुकाकर, सह-यात्रियों का शुक्रिया अदा कर तेजी से प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गई थी। प्लेटफार्म पर ही अगले तीन घंटे जैसे-तैसे काटने होंगे, मन को साफ-साफ बता दिया था। करीब घंटे भर बाद नज़र पड़ी यही कोई बीस मीटर दूर एक खंभे का सहारा लेकर स्लैब पर बैठे सरदार जी पर, वही सैंसर बोर्ड वाले …

कोई था जो अब भी साथ था, जो अब भी निगहबानी कर रहा था। मुझे बगैर कुछ कहे, मुझसे बगैर कुछ अपेक्षा लिए.. मन में कुछ पिघला था, मन को फिर कोई उस रोज़ झकझोर गया था

ट्रेन में सवार होते हुए एक आखिरी नज़र उस ओर डाली तो हैरत में पड़ गई। सरदार जी अपनी सीट से उठ चुके थे, दस कदम आगे बढ़ आए थे, मुझे सवार होते देखा और लौट गए .. वापस, अपनी जगह। जैसे कह रहे हों, अब आगे का सफर अकेले करना है तुम्हें, अपना ख्याल रखना ..

 

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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2 Comments on “Thinking of travelling Solo? Go ahead …”

    1. Well, I have felt safer in many parts of my country like in Goa, Chhattisgarh, Rajasthan, Karnataka and the North East.. Safer than in my own city I.e. Delhi!

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