दर्रा-दर्रा हिमालय के बहाने हिमालय में ट्रैकिंग

कभी—कभी असली यात्राएं और ट्रैकिंग के बहाने मैं यहां आपसे मुखातिब होती है लेकिन इस बार अभी तक हिमालय ने पुकारा नहीं है! हां, इस बीच हिमालयी सरोकारों पर किताबें पढ़ने, चर्चाओं में भाग लेने, लेखकों-यायावरों को सुनने का सौभाग्य मेरे हिस्से आया। एक किताब जिसे बीते दिनों लगभग हर दिन खंगाला-पलटा उसे आप सभी के लिए पेश करने से खुद को रोकना ज़रा मुश्किल है —

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यह जानना सुखद अहसास से भर देने के लिए काफी है कि एक परिवार ऐसा भी है जो आज भी तीर्थयात्राओं के प्राचीन मार्गों को खोजते हुए, हमारे पूर्वजों के पदचिह्नों को टटोलने के साथ-साथ पौराणिक कथाओं के जरिए बयान होने वाले यात्रा मार्गों को खोजने में जुटा है। इसी परिवार की रोमांचकारी घुमक्कड़ी की दास्तान है “दर्रा दर्रा हिमालय” (अजय सोडानी) जो अगस्त 2014 में राजकमल प्रकाशन के नए इंप्रिंट “सार्थक” के बैनर तले बाज़ार में आयी थी।

दर्रा दर्रा हिमालय” एक परिवार की हिमालय की वादियों, पहाड़ों दर्रों और गगनचुंबी शिखरों तक की यात्राओं का दिलचस्प ब्योरा है। इंदौर के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ अजय सोडानी और उनके परिवार के उन हौंसलों की दास्तान है जिनके दम पर वे कभी उन हिमालय क्षेत्रों में जाते रहे जिनसे होकर हमारे पूर्वज गंगोत्री से केदारनाथ तक तीर्थयात्राएं किया करते थे तो कभी पौराणिक कथाओं के सच की पड़ताल करने के लिए ही बैक पैक बांधकर हिमालयी शिखरों की ओर निकल पड़े थे। अजय सोडानी स्वीकार करते हैं कि हिमालय के विलुप्त हो रहे सौंदर्य को मापने और उसकी गोद में पलते समाज को नज़दीक से देखने&जानने के आग्रह के साथ उनकी जो यात्राएं शुरू हुई थीं वे आगे चलकर खुद की तलाश में बदल गईं। फिर उन्हें यह भी महसूस हुआ कि दुनिया के इस अद्भुत हिस्से के बारे में दुनिया के एक बड़े हिस्से को कुछ भी नहीं मालूम। और तब उन्होंने फैसला किया कि बीते कई दशकों की यात्राओं को सिलसिलेवार तरीके से समेटकर सामने लाने की जरूरत है। बस इसी जरूरत की परिणति हुई “दर्रा दर्रा हिमालय” की शक्ल में।

एडवेंचर के किस्से पढ़ने हों, हिमालयी बुलंदियों पर जाना हो, ट्रैकिंग-स्कींग-पैराग्लाइडिंग जैसे एडवेंचर स्पोर्ट्स का शौक मांझना हो तो इनके बारे में और जानकारी हासिल करने के लिए किताबों की दरकार सबसे पहले सामने आती है। और हिंदी का पाठक तब मजबूरन या तो औसत से कमज़ोर साहित्य पढ़ने को मजबूर होता है या फिर अंग्रेज़ी की तरफ झांकता है। और इस तरह हम एक अच्छा पाठक अपने पाले में आने से पहले ही खो देते हैं! लेकिन “दर्रा दर्रा हिमालय” जैसी किताब ने साहसिक यायावरी को हिंदी में जिस बेहतरीन ढंग से पेश किया है उसे पढ़कर आने वाले समय में इस कमी को दूर करने की उम्मीद बंधती दिखती है।

अजय सोडानी पारंपरिक मायने में शब्दतराश नहीं हैं, लिहाजा उनके यात्रा वृत्तांत भारी-भरकम साहित्यिक जुमलों और मुहावरेबाजी से दूर हैं। उनके बयान में सफर की रवानी है, कभी ठीक वैसे ही हांफते-गिरते शब्द हैं जैसे दर्रों को पार करते हुए हवा से आॅक्सीजन के कम हो जाने पर ट्रैकर के हाल होते हैं तो कभी किसी ढलान पर से तेजी से रपटते पर्वतारोही की सी तेजी के साथ उनकी एडवेंचर कथा दौड़ पड़ती है। इस लिहाज से यह किताब ताज़गी का अहसास लेकर आयी है। बंधे-बंधाए ढर्रों और स्थापित लेखन शैली से अलग अपनी मतवाली राह चलती हुई लेखक की भाषा कहीं भी ठहराव नहीं लिए हुए है। उनके पास ढेरों यात्राएं हैं, अनगिनत यात्रा मार्ग और पड़ाव हैं, उनकी खूबियां और चुनौतियां हैं और एडवेंचर के जाने कितने ही किस्से हैं जिन्हें पाठको के साथ बांटने की धुन है। आॅडेन कोल की एडवेंचर यात्रा हो या कालिन्दी खाल जैसी बेहद खतरनाक यात्राओं की किस्सागोई या कभी टिहरी बांध के बहाने तो कभी ट्रैकिंग रूट पर कचरे के जिक्र के चलते वे हिमालय के नाजुक पर्यावरण पर भी चिंता जाहिर करते हैं। यायावरी के बहाने सामाजिक सरोकारों तक को छूती यह किताब असल में यात्राओं से परे भी दूर तक ले जाती है।

किताब आॅनलाइन उपलब्ध है।

 

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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