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सर्दियों की आहट है जंगलों के बंद कपाट खुलने की चाभी!

मानसून सिमटने के बाद अक्टूबर-नवंबर तक आते-आते जंगलों में बहार देखने लायक होती है। हरियाली अपने शबाब पर होती है, पेड़ों की शाखें बारिश से धुलने के बाद इतराने लगती हैं और पूरे जंगल में जिंदगी एक बार फिर नए सिरे से करवट लेती दिखती है। देशभर के नेशनल  पार्क, जो पिछले तीन-चार महीनों से बंद पड़े थे, एक बार फिर सैलानियों के स्वागत को तैयार दिखते हैं। बस्तर के तीरथगढ़ नेशनल पार्क से लेकर उत्तराखंड में काॅरबेट, राजाजी पार्क तक के दरवाजे एक-एक कर खुलने लगते हैं।

Pic Courtesy _-Uttrakhand Tourism Development Board
Pic Courtesy – Uttrakhand Tourism Development Board

वन्यजीव प्रेमियों के अलावा नैचुरलिस्ट, इको-टूरिस्ट और छुट्टियों में सैर-सपाटै के इच्छुक सैलानी यों तो पूरे साल भर नेशनल पार्कों और अभयारण्यों में आते-जाते रहते हैं लेकिन सर्दियों का समय इस लिहाज से कुछ अलग और खास होता है। ट्रैवल पोर्टल मेकमाइट्रिप डाॅट काॅम के चीफ बिजनेस आॅफिसर मोहित गुप्ता कहते हैं – “भारत में वाइल्डलाइफ टूरिज़्म बीते सालों में तेजी से लोकप्रियता के पायदान लांघकर आज काफी आगे पहुंच चुका है। अक्टूबर-नवंबर से लेकर फरवरी-मार्च तक का समय देश के विभिन्न हिस्सों में फैले अभयारण्यों, राष्ट्रीय पार्कों, संरक्षित वन क्षेत्रों में सैर-सपाटे के लिहाज से काफी उपयुक्त है। काॅरबेट (उत्तराखंड), सरिस्का, कुंभलगढ़, भरतपुर और रणथंभौर (राजस्थान), मुडुमलाई (तमिलनाडु), पेंच, बांधवगढ़ और कान्हा (मध्य प्रदेश), तडोबा (महाराष्ट्र), सासन गिर (गुजरात), वायनाड (केरल), काज़ीरंगा (असम), सुंदरबन (पश्चिमबंगाल), बांदीपुर और काबिनी (कर्नाटक) में देशभर से ही नहीं बल्कि विदेश से भी वन्यजीव प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंचने लगे हैं।”

यही वो समय होता है जब एक से एक दुर्लभ जंतु और कभी-कभार दिखने वाले जानवर या पंछी भी बाहर आते हैं और दुनिया को उनका दीदार होता है। यों तो देश के लगभग सभी प्रांतों में वन्यजीव बसते हैं लेकिन कुछ राज्यों को तो इस लिहाज से जैसे वरदान मिला हुआ है।

ऐसे ही कुछ राज्य हैं –
उत्तराखंड

यहां कुल-मिलाकर 12 नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी हैं जो राज्य के करीब-करीब 13.8 प्रतिशत भूभाग में फैली हैं। और इन जंगलों में आप जीव-जंतुओं, पक्षियों को तरह-तरह की भाव-भंगिमाओं या मुद्राओं में देख सकते हैंं। उत्तराखंड के वन्यजीव अभयारण्यों की एक और खास बात यह है कि ये 800 मीटर से लेकर 5400 मीटर तक की ऊंचाई पर बसे हैं जिसके चलते वन्यजीव शौकीनों के लिए यहां काफी विविधता को देख पाना संभव होता है। बाघ, हिरन, भालू, हाथी, तेंदुआ, बिलाव, बंदर, लंगूर, बारहसिंघा, चीतल, नीलगाय, अजगर, किंग कोबरा, साही, तरह के सांप-बिच्छू और पंक्षियों की सैंकड़ों प्रजातियां यहां देखी जा सकती हैं।

इसी हिमालयी राज्य में नंदा देवी बायोस्फियररिज़र्व और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान जैसे दो विश्वधरोहर स्थल भी हैं। यहां अद्भुत भौगोलिक परिस्थितियों, जो कि इस उद्यान के हिमनदों और हिमालयी श्रृंखलाओं से घिरा होने की वजह से पैदा हुई हैं, और दुर्लभ वनस्पतियों का संगम किसी भी वन्यप्रेमी को चमत्कृत कर देगा। ट्रैकर्स और पर्वतारोहियों के बीच आज ये दोनों काफी लोकप्रिय बन चुके हैं जहां फूलों की सैंकड़ों प्रजातियों के अलावा पक्षियों की भी जाने कितनी ही प्रजातियां देखी जा सकती हैं। इसी तरह, अस्कोट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी, गंगोत्री नेशनल पार्क, अल्मोड़ा के नजदीक बिनसर पक्षी विहार, केदारनाथ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी, काॅरबेट के नाम किसी भी वाइल्डलाइफ/एडवेंचर प्रेमी को लुभाने के लिए काफी हैं।

लद्दाख

पठारी लद्दाख में ऊंचाई पर बसा हेमिस नेशनल पार्क स्नो लैपर्ड समेत कई और दुर्लभ जीवों की प्रजातियों का गढ़ माना जाता है। हालांकि यहां गर्मियों में मौसम माकूल होता है और पार्क के अंदर ट्रैकिंग के लिए उत्साही एडवेंचर प्रेमी पहुंचते हैं, लेकिन अगर स्नो लैपर्ड का दीदार करना आपकी बकेट लिस्ट का हिस्सा है तो फिर सर्दियों में यहां जाएं। यहां जैव-विविधता के संरक्षण के लिए राज्य का वन्यजीव संरक्षण विभाग प्रोजेक्ट स्नो लैपर्ड जैसे कार्यक्रमों को चलाता है।

गुजरात

रेगिस्तानी राजस्थान से सटे इस राज्य में यों तो हरियाली काफी कम है लेकिन इसकी खास भौगोलिक परिस्थितियों ने ही इसे दुर्लभ किस्म के वन्यजीवन की सौगात भी दी है। नमकीन रेगिस्तान कच्छ के रन में मीलों का सफर तय कर आने पर जहां आपको एक पंछी भी पंख फैलाता नहीं दिखता वहीं पाकिस्तानी सीमा से सटे अरब सागर के किनारे धौलावीरा के नज़दीक फ्लैमिंगो की बस्तियां आपको हैरत में डाल देंगी। भुज से 126 किलोमीटर दूर फ्लैमिंगो सैंक्चुअरी में हर साल सुदूर साइबेरिया की ठंड से बचकर पहुंचने वाले ये राजहंस अपनी अगली पीढ़ी तैयार करते हैं और फिर फरवरी-मार्च तक आते-आते गर्मियों की सुगबुगाहट होते ही अपने वतन लौट जाते हैं। सर्दियों के अगले दो-तीन महीने कच्छ के रन पर फ्लैमिंगों के गुलाबी पंखों का संसार फैला होता है। इसी कच्छ के लिटल रन में जंगली गधे की एक दुर्लभ प्रजाति भी देखने लोग पहुंचते हैं। उधर, गुजरात का सासन गिर वन एशियाई सफेद शेर  की आखिरी शरणस्थली के रूप में विख्यात है।

राजस्थान

थार रेगिस्तान में जहां रेत का संसार ही चारों ओर फैली असलियत है वहीं इसके रेतीले टीलों के पीछे एक नन्हा नेशनल पार्क भी छिपा है। किसी नखलिस्तान की तरह है डैज़र्ट नेशनल पार्क। जैसलमेर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर इस नेशनल पार्क में कैमल (ऊंट) सफारी का अपना अनूठा आनंद है जो आपको रेगिस्तान के पक्षियों से मिलवाती है। इस नेशनल पार्क का ज्यादातर हिस्से बीते दौर में कभी हरहराती रही नमकीन झील के सूख चुके वाॅटरबेड और कंटीली झाड़ियों की ओट में से होकर गुजरता है और ईगल, फैल्कन, वल्चर के अलावा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जैसे जीव-जंतुओं से आपको मिलवाता है।

@Ranthambore
@Ranthambore

उधर, अलवर के नजदीक सरिस्का टाइगर रिज़र्व किसी जमाने में बाघों की आबादी और फिर उनके गायब हो जाने की वजह से सुर्खियों में रहा था। संसार चंद जैसे कुख्यात वन्यजीव तस्करों ने इस जंगल से बाघों को लूट लिया और आज सरिस्का पिकनिक करने के लिए छोटा-मोटा जंगल भर रह गया है। बाघ भले ही न सही, लेकिन कामकाज की भागमभाग से दूर जंगल में होने का अहसास भी कम नहीं होता। वीकेन्ड गेटवे के तौर पर सरिस्का का लुत्फ लेने का बढि़या समय शुरू होता है अब!

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राजस्थान में ही भरतपुर पक्षी विहार भी है जो निचली और दलदली जमीन पर खड़ा है और पानी के यहां जमा हो जाने की वजह से पक्षियों का एक भरा-पूरा संसार यहां पलता है। कहते हैं पक्षियों की करीब साढ़े तीन सौ प्रजातियां यहां देखी गई हैं और राजस्थान से ही नहीं बल्कि साइबेरिया, तुर्कमेनिस्तान, अफ्गानिस्तान, कजाखस्तान, मंगोलिया, तिब्बत तक से परवाज़ भरकर पंछी सर्दियों में केवलादेव नेशनल पार्क (भरतपुर पक्षी विहार) पहुंचते हैं। आपके अंदर भी अगर कोई सलीम अली पल रहा है तो इन सर्दियों में भरतपुर के इस घना पार्क (घने जंगलों ने इसे एक इस नाम से भी विख्यात किया है) में चले आइये। राजधानी दिल्ली से कोटा तक की जन शताब्दी ट्रेन आपको मेज़ से यहां ले आएगी और पक्षी विहार के दरवाजे पर ही आरटीडीसी के सारस रेसोर्ट या फिर जंगल के भीतर आईटीडीसी का होटल भरतपुर अशोक आपकी मेज़बानी के इंतजर में है!

मध्य प्रदेश

पेंच, कान्हा, बांधवगढ़ जैसे वि’वविख्याल नेशनल पार्कों वाले हिंदुस्तान के दिल को न भूल जाइये। जंगल की सैर की सबसे मुफीद और सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है यह राज्य। बांधवगढ़ में जहां आपके लिए एलीफेंट सफारी का इंतज़ाम है और बाघ के ‘दर्शनों’ की लगभग पूरी-पूरी गारंटी भी वहीं पेंच और कान्हा भी कम दिलचस्प जंगल नहीं हैंं।

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इसी राज्य में पन्ना टाइगर रिज़र्व भी है जो बाघ का दीदार करने पहुंचने वाले हुजूम से कुछ बचा रहता है और यही वजह है कि गोंद, साल, सागवान, महुवा जैसे घने पेड़ों से घिरे इस जंगल में टाइगर सफारी का अपना अलग रोमांच है।

 

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वाइल्डलाइफ का एक और पन्ना यहां जुड़ता है खजुराहों से करीब 30 किलोमीटर दूर केन घडि़याल सैंक्चुअरी में। केन नदी के तट पर घडि़यालों की इस बस्ती को भी आप अपनी मंज़िल बना सकते हैं। मानसून के बाद केन जलप्रपात का सौंदर्य और कैन्यन जैसे नज़ारों के साथ-साथ घडि़यालों को देखना कुछ अलग किस्म का अनुभव साबित होता है।
और पूर्वोत्तर को कौन भूल सकता है?

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Inside Kaziranga

 

असम में काज़ीरंगा नहीं देखा तो आपके वाइल्डलाइफ दीवानगी किस काम की? यहां एक सींग वाला गैंडा बसता है और इनकी संख्या भी इतनी अधिक है कि पार्क में घुसने से पहले ही वो खुद आपके दीदार के लिए चले आते हैं ! लेकिन ज़रा बचकर, संभलकर और पार्क के नियमों का पूरा पालन कर जीप सफारी में गार्ड के साथ ही जाएं – देखने में भले ही भारी काया का होता है गैंडा लेकिन उसकी रफ्तार आपकी 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे से दौड़ती जीप को भी पछाड़ सकती है। काज़ीरंगा नेशनल पार्क भी मानसून की छुट्टियों के बाद 1 नवंबर से खुल चुका है और आप ही के इंतज़ार में है।

पूर्वोत्तर में ही नामदाफा नेशनल पार्क है जो अरुणालचल प्रदेश जैसे खूबसूरत हिमालयी राज्य में है। पूर्वोत्तर की जमीन पर यों तो पूरा इलाका ही खूबसूरत वन प्रदेशों से होकर गुजरता है लेकिन नामदाफा सैलानियों के बीच काफी पसंदीदा बन चुका है। बांस के घने जंगलों में हरियाली की चादर तानकर फैले यहां के अभयारण्यों में आपको वन्यजीवन का एक अलग अंदाज दिखायी देगा। इसी तरह, असम में मानस नेशनल पार्क के अलावा और कई फाॅरेस्ट  रिज़र्व, सैंक्चुअरी हैं जहां गोल्डन लंगूर से लेकर जाने कितने ही जीवों की दुर्लभ प्रजातियां आपको देखने को मिलेंगी।

तो चले आइये सर्दियों की आबोहवा में पूर्वोत्तर और इसके वन्यजीवन को नजदीक से देखने। गोवाहाटी और बागडोरा तक विमानसेवाओं के जरिए या फिर दीमापुर, जलपाइगुड़ी, कोलकाता, डिब्रूगढ़ तक रेल संपर्क और आगे सड़क मार्ग से पूर्वोत्तर को टटोलिए, यहां के लोगों और जीव-जगत से परिचित होने का यह उपयुक्त समय है, और वक्त का तकाज़ा भी!

वाइल्डलाइफ सफारी

नदियों के किनारे-किनारे, खुली घाटियों में, मैदानों में, पहाडि़यों पर, हिमालयी श्रृंखलाओं की निगहबानी में जंगल सफारी का मज़ा ही कुछ और होता है। ये सफारी लद्दाख की धरती से लेकर स्पीति-किन्नौर तक, कुमाऊं-गढ़वाल की हिमालयी जमीन से राजस्थानी रेत तक का सफर कराते हुए आपको पशुओं-पक्षियों के संसार की झलक दिखाती हैं। जंगल की सैर करने के तरीके भी कई-कई होते हैं। इनमें प्रमुख हैं –

जीप/ कैंटर सफारी

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रणथंभौर के जंगलों से लेकर बांधवगढ़ तक की पगडंडियों को नापने के लिए जीप सफारी बढि़या जरिया है। लेकिन इनके लिए बुकिंग काफी पहले (कई बार 90 दिन एडवांस में) करने पर आप मन मुताबिक दिन-समय में जंगल की सैर कर सकते हैं। बर्ड वाॅच और वाइल्डलाइफ टूर भी जीपों पर कराए जाते हैं। दिन में जीप से जंगलों को खंगालना और रातों में जंगल कैंप का एडवेंचर आज कोई अजूबा नहीं रह गया है। देशभर के कई नेशनल पार्कों में यह सुविधा उपलब्ध है।

हाथी की पीठ पर सफारी

हाथी की सवारी भी सफारी के लिए माकूल होती है। देहरादून-ऋषिकेश के नजदीक बने राजाजी नेशनल पार्क में हाथी सफारी के लिए बाकायदा काॅरीडोर बनाया गया है। इस तरह आप मेन रोड से दूर, हौले-हौले मस्त चाल चलते हाथी की सफारी का लुत्फ ले सकते हैं और शर्मीले वन्यजीवों को करीब से देख सकते हैं।

जंगल ट्रैक

केरल की पेरियार वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी को दिन में देखने नौकाओं में जाया जाता है जबकि इसके आसपास फैले जंगल में नाइटलाइफ के लिए रात्रिकालीन ट्रैकिंग की भी व्यवस्था है। नैचुरलिस्ट और गाइड रात में आपको इन जंगलों में वो सब दिखाने ले जाते हैं जिन्हें किसी भी सूरत में दिन में देखा नहीं जा सकता! दरअसल, जंगलों के कितने ही जीव-जंतु रात में जागते हैं, शिकार पर निकलते हैं, टहलते हैं, उड़ते हैं, सरकते हैं और यही समय होता है जब जंगल में नाइटलाइफ को उसकी पूरी विविधता और जीवंतता में देखा जा सकता है। नाइट ट्रैकिंग के लिए टाॅर्च, जूतों से लैस, मच्छरों-कीटों से बचाव के लिए शरीर को पूरी तरह ढककर निकला जाता है और पैदल चलते हुए उस जीवन से मिलने का मौका मिलता है जो अन्यथा हमें कभी दिखायी नहीं देते।

Dainik Tribune, a leading daily of North India has also published this story, here is the link –

http://epaper.dainiktribuneonline.com/375435/Ravivarya/DM_16_November_2014#dual/4/2

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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