Nanda Rajjaat Yatra – Himalayan Odyssey

नंदादेवी राजजात यात्रा – आस्था का उत्सव
आराध्या से पुत्री बनी मां नंदा की मायके से विदाई का सांस्कृतिक जलसा

असहाय निर्भयाओं के युग में उत्तराखंड में बेटी के प्रति लाड़-प्यार की बरसों पुरानी सामूहिक परंपरा – नंदादेवी राजजात यात्रा इस मायने में सुकून पहुंचाती है कि समाज में आज भी बहुत कुछ ऐसा बचा रह गया है जिसे सहेजा जाना चाहिए, जिस पर फख्र किया जा सकता है।
और यह भी कि कैसे विषम-विकट भूगोल पर आस्था भारी पड़ती है …

पहाड़ी आस्थामय समाज के बेटी पर बरसते निश्छल स्नेह का पर्व नंदा देवी राजजात यात्रा हर बारह बरस में एक बार आयोजित किया जाता है, लेकिन बीते सालों का इतिहास गवाह है कि शायद ही यह यात्रा कभी अपनी निर्धारित अवधि में हो पायी हो। अंतिम बार 2000 में इस यात्रा का आयोजन किया गया था, और एक बरस की देरी के बाद जब 2013 में इसके आयोजन की तैयारियां चल रही थी तभी उत्तराखंड में आयी प्राकृतिक आपदा ने मां नंदा की विदाई को एक बरस के लिए और टाल दिया। आखिरकार 18 अगस्त, 2014 को राजजात शुरू हुई और 6 सितंबर को होमकुंड में मां की डोली के विसर्जन के साथ यात्रा संपन्न हो गई।

photo Credit - Dr. Atul Nautiyal

उत्तराखंड के पारंपरिक समाज की झलक यों तो यहां साल भर मनाए जाने वाले त्योहारों में साफ देखी जा सकती है लेकिन लोकपरंपराओं की पराकाष्ठा देखनी हो तो बारह वर्ष में आयोजित होने वाली नंदादेवी राजजात यात्रा को देखा जा सकता है। हिमालयी महाकुंभ के नाम से विख्यात एशिया की यह सबसे बड़ी पैदल धार्मिक यात्रा है जो गढ़वाल के चमोली जिले में नौटी गांव से शुरू होकर 20 दिनों में लगभग 280 किलोमीटर का कठिन मार्ग तय करती है जिसमें से आखिरी 100 किलोमीटर तो बेहद दुर्गम कहे जाते हैं। लेकिन भूगोल की इन कठिनाइयों से भक्तों को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। उत्तराखंड के कोने-कोने से तो यात्री इसमें जुड़ते ही हैं, देश-विदेश से आने वाले भक्तों की भी भरमार रहती है।

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नंदा देवी राजजात समिति के सचिव भुवन नौटियाल इसे दुनिया की सबसे अद्भुत यात्रा का दर्जा देते हुए बताते हैं – ”हिमालयी क्षेत्र में 17,500 फुट की ऊंचाई तक पहुंचने वाला इसका यात्रा मार्ग बेहद दुर्गम, विकट होने के साथ-साथ कुछ हिस्सा तो निर्जन भी है। बेदिनी से आगे पातर नचैडि़यां, ’िाला समुद्र, चंदनिया घाट जैसे निर्जन, चट्टानी भूभागों से गुजरना आसान नहीं है। ग्लेशियरों, घाटियों, पर्वत  शिखरों से घिरे विसर्जन स्थल होमकुंड तक इस साल 15-20 हजार भक्त पहुंचे। होमकुंड में चैंसिग्या खांडू की विदाई और छंतोलियों का प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही उन्होंने वापसी की राह पकड़ी। लेकिन इससे भी कहीं बड़ी संख्या उन यात्रियों की रही जो राज्य के अलग-अलग जिलों से निकलने वाले करीब 500 सहायक यात्रा मार्गों से होते हुए मुख्य यात्रा से जगह-जगह जुड़ते रहे। पिछले तमाम रिकार्ड धराशायी करते हुए इस बार करीब 1 करोड़ दर्शनार्थियों / यात्रियों ने नंदा राजजात यात्रा में भाग लिया जिनमें कुछ मां नंदा को विदा करने अपने अपने क्षेत्रों की सीमाओं तक जुड़े तो कुछ यात्रा मार्ग पर आगे के पड़ावों में पहुंचे और यात्रा के संग हो लिए।”

photo Credit - Dr. Atul Nautiyal

नौटी गांव के नौटी धाम से नंदा अष्टमी के दिन नंदादेवी राजजात यात्रा का शुभारंभ होता है। कैलास से मायके आयी पुत्री को विदा करने की घड़ी है। उत्साह-उमंग के साथ-साथ मन में बेटी से बिछोह की पीड़ा आंखों में नमी बनकर उभर आती है। पहले दिन मां नंदा की डोली चैसिंग्या खांडू (चार सींगों वाला मेढ़ा) के मार्गदर्शन में नौटी से 10 किलोमीटर दूर यात्रा मार्ग के पहले पड़ाव ईड़ा बधाणी पहुंचती है। यहीं रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन फिर नौटी लौटती है। तीसरे दिन डोली नौटी से पूरी तरह विदाई लेकर कांसुवा पहुंचती है जहां उसके स्वागत में राजसी वैभव दिखाई देता है। इस बीच, नौटी में विदाई के बाद खामोशी पसर चुकी है। बीते कई रोज से बेटी को ससुराल भेजने की तैयारियों में जुटे घरों की रौनक जैसे गायब हो गई, चहल-पहल थम गई है। इस प्रमुख यात्रा से जुड़ने के लिए राज्य के अलग-अलग जिलों से भी मां नंदा की डोलियां विदा लेने लगती हैं। भुवन नौटियाल ने बताया कि इस बार राजजात इस मायने में भी अनूठी थी कि इसमें कुमाऊं की भागीदारी बढ़ी। जब 2000 की यात्रा में अल्मोड़ा की नंदा देवी यात्रा में आयी थी तो पूरे 75 साल के बाद राजजात में अल्मोड़ा की भागीदारी हुई थी। इसी तरह, इस बार पिथौरागढ़ की मुन्स्यारी तहसील के मल्ला जोहार के मर्तोली गांव से नंदा देवी ने शताब्दियों बाद राजजात से जुड़कर इसे महिमा प्रदान की। (मर्तोली से आगे वेदनी तक का मार्ग पूर्व में ग्लेशियर के चलते कटा रहा था, और यही वजह थी कि यहां से नंदा देवी जात से नहीं जुड़ पाती थी, 1925 के बाद इस बार पूरे 89 साल बाद यहां से मां नंदा गढ़वाल के नंदकेशरी में मुख्य जात से जुड़ीं )। चैखुटिया से भी पहली बार राजजात यात्रा का आयोजन किया गया। शंखध्वनि, मंत्रोच्चार के बीच नौटी से चलने वाली राज छंतोली से एक-एक कर अलग-अलग इलाकों की छंतोलियां जुड़ती जाती हैं जो वास्तव में, मां नंदा की दिव्य शक्ति की सूचक होती हैं। इन छंतोलियों को उत्तराखंड में उगने वाले एक खास प्रकार के बांस रिंगाल और भोजपत्र से बनाया जाता है जिसमें सैंकड़ों शिल्पकारों की सेवाएं ली जाती हैंं। मां की डोली उठाने के लिए डोल्यारों (डोली उठाने वाले ग्रामीण) का समर्पण देखने योग्य होता है वहीं जिस पड़ाव पर डोली पहुंचनी होती है वहां के ग्रामीणों का नंदा पथ पर टकटकी लगाकर इंतजार करना भी भाव-विह्वल कर जाता है।

photo Credit - Dr. Atul Nautiyal
आतिथ्य की खूबसूरत परंपरा हर पड़ाव पर निभायी जाती है। कांसुवा से सेम, वाती, कुलसारी, चेपदू, नंदकेशरी और फल्दियागांव के बाद मंदोली जैसे पड़ावों से गुजरते हुए मां नंदा पर नेह आशीष बरसता है। सेम में नंदा देवी का प्राचीन मंदिर है और इस वजह से यहां जात के पहुंचने का विशेष महत्व माना गया है। गांव वालों की नंदा के प्रति आस्था की पराकाष्ठा इतनी है कि वे यात्रा के साथ आए हर यात्री को नंदा के रूप में देखते हैं। आतिथ्य का यह भाव ही इस यात्रा को अनुपम छटा से रंगता चलता है।

वाण के बाद शुरू होती है यात्रियों की परीक्षा

यात्रा के कुल 20 पड़ावों में से 12 पड़ाव सड़क मार्ग से जुड़े हैं जहां यात्री पैदल या फिर मोटर मार्ग से पहुंच सकता है, लेकिन 12वें पड़ाव वाण से आगे की यात्रा सिर्फ पैदल ही हो सकती है। वाण में ही अन्य जगहों से आयी छंतोलियों और डोलियों का मिलन राजजात से होता है। डोलियों तथा छंतोलियों के मिलन का यह अंतिम पड़ाव होता है और यहां से आगे यात्रा एक साथ एक रूप में आगे बढ़ती है।

10 किलोमीटर दूर इससे अगला गैरोली पातल यात्रा का पहला ऐसा पड़ाव है जिसका सड़क मार्ग से कोई संपर्क नहीं है और सच पूछा जाए तो भक्तों की असली परीक्षा भी यहीं से शुरू हो जाती है। अब पैदल रास्ते की जर्जर हालत, तीखी खड़ी चढ़ाई, कहीं उतनी ही तीखी उतरान तो कहीं कीचड़ से सने रास्ते भक्तों की कदम-कदम पर परीक्षा लेते हैं। चढ़ाई के साथ-साथ हवा में आॅक्सीजन घटती जाती है और उसी से मार्ग की चुनौतियां गंभीर होने लगती हैं। गैरोली पातल की चढ़ाइयों को पार करते-करते यात्री मखमली, मुलायम बुग्यालों तक पहुंचते हैं। अब ऊंचे-घने पेड़ों के सिलसिले खत्म हो गए हैं, वनस्पति बौनी होते-होते सिर्फ घास और कुछ हिमालयी जड़ी-बूटियों के रूप में बची है। आगे वेदनी बुग्याल में यात्रियों के रात्रि विश्राम के लिए जैसे टैंट नगरी बिछ जाती है। यहीं वेदनी कुंड में पितरों का श्राद्ध भी किया जाता हैं। जनश्रुति के अनुसार यहीं शिव-पार्वती विवाह हुआ था। वेदनी के बाद राजजात का मार्ग कठिन से कठिनतर होता जाता है। वेदनी बुग्याल के आगे मार्ग की दुर्गमता इतनी बढ़ जाती है कि अधिकांश लोग यहां से लौट जाते हैं, तो भी इस बार लगभग 15-20 हजार भक्तों ने वेदनी के आगे की यात्रा पूरी की। परंपराओं में बंधे समाज की इस आस्था को आप कोरा उत्साह नहीं कह सकते, कहीं न कहीं उनके संस्कारों में नंदामय हो जाने का भाव गुंथा है।

रूपकुंड से होमकुंड

बुग्यालों से ऊपर स्नो लाइन से गुजरते हुए यात्री नंगे पहाड़ों की तरफ बढ़ते हैं। इन खड़ी चढ़ाई वाले चट्टानी पहाड़ों के बीच ही रहस्य-रोमांच से भरा रूपकुंड है। हालांकि चट्टानों के बीच किसी कुंड या झील के होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती मगर यही भौगोलिक स्थिति इस कुंड को और भी रहस्यमयी बनाती है। कहते हैं कैलास यात्रा के दौरान जब नंदा को प्यास लगी तो शिवजी ने अपने त्रिशूल से इस कुंड की रचना की थी। इसी कुंड के पारदर्शी पानी में उन्होंने नंदा के सौंदर्य को भी निहारा था। । बीते वर्षों में इसी रूपकुंड के इर्द-गिर्द जमा नर-कंकालों ने इसका रहस्य और गहराया है। पत्थरों से घिरे कुंड में और बाहर कुछ नंर-कंकालों पर तो मांस के लोथड़े तक जमा हैं। राजजात आने वाले कुछ यात्रियों का इसमें शामिल होना रूपकुंड के इस रहस्य तक पहुंचना भी हो सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

रूपकुंड के बाद यात्री ज्यूरागली की खड़ी चढ़ाई चढ़ते हैं। यही हिस्सा पूरी राजजात का सबसे कठिन भी है और नब्बे डिग्री की तीखी चढ़ाई वाले चट्टानों पर एकाग्रता टूटते ही सीधे नीचे कुंड की हजारों मीटर गहराई में गिरना निश्चित है। साढ़े सत्रह हजार फुट पर यही यात्रा का सबसे ऊंचा बिंदु भी है। सामने के पहाड़ अगर कोहरे की चादर में नहीं लिपटे होते तो यहां से नंदा देवी की चोटी के दर्शन होते हैं। अब भक्तों की अगली मंजिल शिला समुद्र है, बड़े-छोटे पत्थरों का पूरा झुंड है जो बेहद भयावह लगता है और शायद इसी वजह से इस जगह का नाम शिला समुद्र पड़ा होगा। ये नितांत निर्जन इलाके हैं, जहां सालभर प्रकृति अपने एकांत को जीती है। लेकिन हिमालयी महाकुंभ के मौके पर यहां जन-सैलाब जैसे उमड़ा पड़ा है। यहां भी टैंटों का पूरा एक संसार उग जाता है जिनमें थके यात्री रुकते हैं और प्रकृति की निस्तब्धता को जैसे झिंझोड़ जाते हैं। यह इलाका ग्लेशियरों से पटा पड़ा है और सामने हिमालय की धवल पर्वत श्रृंखलाएं तीर्थयात्रियों को कुछ पल ही सही अपनी विराटता से अचंभित अव’य कर जाती हैं। यात्री अब अपनी मंजिल होमकुंड के नज़दीक पहुंचते हैं। यहीं यात्रा का विसर्जन होना है। चैसिंग्या खांडू को भी नंदा के ससुराल यहीं से विदा किया जाना है। पूरी यात्रा में उसकी पूरी सुरक्षा और देखभाल की गई है, लेकिन यहां से आगे कैलास का सफर उसे अकेले ही तय करना है। उसकी पीठ पर नंदा को मैत से मिले उपहार बांधकर छोड़ दिया जाता है। डोलियां और छंतोलियां भी होमकुंड में विसर्जित की जाती हैं और पूजन के बाद यात्री लौटने लगते हैं। परंपरानुसार पीछे मुड़कर चैसिंग्या को देखने की मनाही है, लिहाजा यात्री मां नंदा से यहीं विदा लेते हैं।

6 किलोमीटर आगे अगला पड़ाव चंदनिया घाट है। लोगों में अब घर लौटने की जल्दी दिखायी देने लगती है, कोई इस पड़ाव पर रुकने का इच्छुक नहीं होता और 18 किलोमीटर दूर अगले पड़ाव सुतोल की तरफ तेजी से बढ़ जाना चाहते हैं। लेकिन रास्ते ने अभी अपनी चुनौतियों को कम नहीं किया है, वही पत्थरों का सैलाब, उतरना, चढ़ाई और कुछ आगे नंदाकिनी नदी का रोखड़ पैरों की गति को रोक बेशक न पाए मगर उसे काफी कम जरूर करता है। मार्ग की मुसीबतें अभी भी कम नहीं होतीं। अलबत्ता, अब राह की निर्जनता सुतोल में आकर टूटती है। पिछले कई दिनों से इंसानी सभ्यता से कटे रहने के बाद यहां आकर एक बार फिर संसार से वास्ता कायम होता है। सुतोल से अगला पड़ाव 25 किलोमीटर बाद घाट में है जहां से नौटी 60 किलोमीटर दूर रह जाता है।

आराध्या नहीं नेह-दुलार की प्रतिमूर्ति है मां नंदा

शिव अर्धांगिनी गौरा जब अपने कैलासवासी पति से मायके जाने की आज्ञा मांगती है तो मायके में मिलने वाली तरह-तरह की वस्तुओं के बारे में गिनाती है –

मेरा मैत होला स्वामी झालू की काखड़ी, मेरा मैत होता स्वामी बाड़ू की मुंगरी‘ (मेरे मायके में बेल खीरे और बाड़ मकई से सजी है)। मायके की इस सौगात को गिनाते हुए गौरा का गर्वबोध ऐसे जागरों से स्पष्ट होता है। ससुराल में आए हुए पार्वती को पूरे बारह बरस और छह माह बीत चुके हैं, इस बीच उसके वस्त्र घिस चुके हैं, वह अपनी पीड़ा कुछ ऐसे जताती है – ”बारा ह्वैगा बरस छई ह्वैगा मासो, मेरी अंगुरी फटीगे क्वैन्यू माथी ऐगे, घाघरा फटीगक घुन्यूं माथी ऐगे।”

नंदा के ये जागर ही उत्तराखंडी लोकपरंपराओं की थाती हैं और इनके माध्यम से लोक जीवन की सहज झलक मिलती है। साथ ही, यहां के जीवन की कठिनाइयों, आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का आभास भी होता है। इन जागरों से एक और बात तो सामने आती है वह यह कि समूचे उत्तराखंड की नंदा देवी की विदाई की राजजात यात्रा यह पहाड़ी समाज इस प्रकार से करता है जैसे किसी साधारण जन की पुत्री अपने मायके से ससुराल लौट रही हो, वही दुलार, वही स्नेह का भाव और आराध्या मां नंदा ऐसे में कहीं छिप सी जाती है। नंदा की विदाई के ये पल बेहद भावुक कर देने वाले होते हैं। रुंधे गले से जागर गाती महिलाएं पंडितों-पुरोहितों को डोली विदा करने से रोकती हैं, छंतोलियो से लिपट जाती हैं और बेटी को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देना चाहती। पूजनीय मां नंदा और धियाड़ी (बेटी) नंदा का यह स्वरूप संभवतः उत्तराखंड में ही संभव है जिसने आराध्या और अलौकिक को साधारण मनुष्य की तरह अपनी संस्कृति में सहेजा है। लोग नदी-नालों, गधेरों, खेतों, ग्लेशियरों को पार करते हुए अपनी प्रिय पुत्री को विदा करने की इस यात्रा में उत्साहपूर्वक जुड़ते हैं। उत्तराखंड समाज के मन में मां के रूप में रहने वाली देवी जिस क्षण पुत्री बनकर विदा लेती है वह बहुत ही भावुक क्षण बन जाता है। और वह किसी एक की नहीं बल्कि सभी की बेटी होती है उस पल। पुत्री नंदा को हिमप्रदेश कैलास भेजने की विदाई की इस यात्रा में जो शामिल नहीं हो पाते वे भी अपने-अपने शहरों, गांवों से निकलने वाली राजजात यात्राओं को तब तक निहारते हैं जब तक अगले किसी मोड़ से मुड़कर वह ओझल नहीं हो जाती। आंखों में आंसुओं का और सड़कों, गलियों, पगडंडियों पर जन समूह का सैलाब उत्तराखंड के पर्वतों-घाटियों को पूरे बीस दिन गुंजायमान रखता है।

वार्षिक राजजात भी

चमोली के नंदाधाम से शुरू होने वाली राजजात बारह बरस में एक बार होती है लेकिन कुरुड़ की नंदाजात हर साल आयोजित होती है। यह अपेक्षाकृत काफी छोटे मार्ग से गुजरती है और इसकी अवधि भी कम होती है। हिमालयी विषयों के अध्येता और इतिहासकार डाॅ शेखर पाठक कहते हैं, ”कुरुड़ की लोकजात भले ही छोटी होती है लेकिन इसमें राजजात की पूरी ‘इन्टेन्सिटी’ को महसूसा जा सकता है। परंपरागत वाद्ययंत्रों, रणसिंघे और शंखध्वनि के साथ परंपरागत पूजा-अर्चना के बीच डोली की विदाई और लाडली नंदा को कैलास भेजने की कुरुड़ की लोकजात यात्रा भी उनके लिए दर्शनीय होती है जो बारह वर्षों में आयोजित होने वाले इस सचल महाकुंभ का हिस्सा बनने से वंचित रह जाते हैं। और मज़ेदार बात यह है कि इस वार्षिक यात्रा में उतनी अराजकता भी नहीं होती जितनी राजजात जैसे बड़े आयोजन में होना स्वाभाविक है।”

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कब                  : 12 वर्ष में एक बार
अंतिम आयोजन : 18 अगस्त, 2014 से 06 सितंबर, 2014
कहां                 : गढ़वाल उत्तराखंड
अगली नंदादेवी राजजात यात्रा : 2024

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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