Moghul Road – Highway to Heaven

मुगल दौर की पदचाप को आज भी सीने में समेटे है मुगल रोड

आसपास धुंध थी, और पूरे माहौल में एक असहज चुप्पी पसरी हुई थी। सिर्फ हमारे दिल की धड़कनों का शोर उस चुप्पी को भंग कर रहा था। सहमना क्या होता है, इसका अहसास उस रोज़ मुझे बखूबी हुआ था …. और ठीक उस घड़ी पूरब में धुंध की चादर को धीमे से उठाते हुए सूरज की अठखेलियां दिखायी दी … दुनियाभर में जाने कहां-कहां के सूर्योदय और सूर्यास्त के बखान सुने हैं अब तक, लेकिन चनाब पर से उगता सूरज भी इतना हसीन दिखता होगा, किसी ने नहीं बताया था… जम्मू पार कर अखनूर से निकलते ही हम राजौरी में दाखिल हो चुके थे। पीर-पंजाल की गोद में यहां चनाब आसपास के माहौल से पूरी तरह बेखबर,  हौले—हौले सरकती है, और इसी मंथर चाल से कुछ ही किलोमीटर दूर पाकिस्तान होते हुए अरब सागर से जा मिलती है। राजौरी में इसी चनाब पर बने पुल से गुजरते हुए सवेरे का उगना देखा उस रोज़। मिचमिचाती आंखों से अंगड़ाई लेते सूरज ने चनाब पर पसरी धुंध को कुछ धकियाया तो जरूर लेकिन कोई खास कामयाबी उसके हाथ लगी नहीं। बादलों की शैतानियों ने सूरज को कहीं का नहीं छोड़ा था, पहाड़ियों से जैसे उतरते बादलों से भरे ट्रक उस रोज़ राजौरी के आसमान पर अपना सारा माल-असबाब उलटने के मूड में थे। कुछ ही देर में वो मनमौजी बादल झमाझम बरसने भी लगे। इस बीच, हमारी टवेरा भी चनाब पर बने पुल को काफी पीछे छोड़ आयी थी। अलबत्ता, सड़क के साथ—साथ दूर तक नदी की एक धार हमारे साथ चलती रही। उसी के किनारे कहीं टैंट तो कहीं जीपें उस पूरे नज़ारे की लय—ताल को तोड़ जाती थीं। सेना की इस छितरायी हुई सी मौजूदगी से धड़कते दिल को थोड़ी राहत मिलना लाज़िम था। जम्मू स्टेशन छोड़े हुए यही कोई दो घंटे हुए जाते थे और अब तक एक भी वाहन ने न हमें ओवरटेक किया था और न किसी से आमना—सामना हुआ था!

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हम मुगल रोड की ओर बढ़ रहे थे। यह वही सड़क थी जिस पर मुगल बादशाह जहांगीर अपने लाव—लश्कर के साथ लाहौर से कश्मीर आया-जाया करता था। अकबर ने 1588 में कश्मीर फतह करने के लिए इसी राह को पकड़ा था।हालांकि अकबर के ज़माने से ही लाहौर और कश्मीर को जोड़ने वाले इस मार्ग पर आवाजाही शुरू हो गई थी, लेकिनइरानी आर्किटैक्ट अली मर्दान खां ने सम्राट जहांगीर के आदेश पर 1605 से 1621 के दरम्यान इस ऐतिहासिक हाइवे का विधिवत निर्माण किया था। बीते दौर में पाकिस्तान से श्रीनगर तक इस मार्ग की लंबाई करीब 170 मील थी और रास्ते में छोटे—बड़े करीब 14 ठौर शाही काफिलों के सुस्ताने के लिए बने थे।

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कहते हैं यूना​नी हमलावर सिकंदर भी इसी मार्ग से उत्तर की ओर अपने साम्राज्य को विस्तार देने के लिए आगे बढ़ा था। उसकी सेना बफलियाज़ (इस नाम को भी कुछ इतिहासकर ग्रीक मानते हैं) तक पहुंची भी थी लेकिन पहाड़ी रास्तों की निर्ममता ने उसे आगे बढ़ने से रोक दिया।

और यहीं इसी सफर में कश्मीर से लाहौर लौटते हुए 1627 में जहांगीर का इंतकाल हो गया था। तब उसकी बेगम नूरजहां ने राजौरी में एक मुफीद—सी जगह देखकर बादशाह की अंतड़ियों को दफन कर दिया। यह जगह अब चिंगस (फारसी चिंगस- आंत) सराय के नाम से मशहूर है। जम्मू से करीब 130 किलोमीटर दूर, नौशेरा और राजौरी के बीच स्थित यह मुगल सराय दरअसल, मुगलकाल में इस मार्ग पर बने ठौर—ठिकानों में से एक थी। नूरजहां ने अपनी लाहौर वापसी तक शहजादों के बीच ताज को लेकर खून—खराबे की आशंका को भांप लिया था, लिहाजा जहांगीर के मृत शरीर में घास—फूंस भरवाकर अपने शाही कारवां के साथ वह लाहौर रवाना हो गई थी। उस कारवां में किसी को कानों—कान खबर नहीं हुई कि अब बादशाह सलामत का सिर्फ जिस्म लाहौर लौट रहा था!

इस रास्ते पर से जहांगीर, अकबर के अलावाशाहजहां और औरंगजेब भी इक्का—दुक्का बार गुजरे हैं। मुगलों का दौर बीत जाने के बाद इस सड़क की उतनी पूछ नहीं रह गई थी और धीरे—धीरे इसका नामो—निशान मिटता चला गया। सत्त्तर के दशक में शेख अब्दुल्ला ने इसे दोबारा बनाने की कोशिश की लेकिन कोई खास कामयाबी नहीं मिली।उन्होंने ही इसे मुगल रोड नाम भी दिया।बात कुछ आगे बढ़ती कि नब्बे के दशक में जब पूरी कश्मीर घाटी आतंक के आगोश में समाने लगी तो मुगल रोड का भी कोई नामलेवा नहीं रह गया। बफलियाज़ पुल को भी दहशतगर्दों ने उड़ाकर खाक कर दिया था और इस तरह मुगल रोड पूरी तरह इतिहास के गर्त में समा गई।

बहरहाल, मुगल रोड बनाने का ख्वाब जिंदा रहा और 2005 में इस पर फिर काम शुरू हुआ। आखिरकार 2008 में हल्के वाहनों के लिए इस मार्ग को खोल दिया गया और 2010 से तो हर साल गर्मियों में इस रूट पर कार रैली भी आयोजित की जाती है।

राजौरी से पुंछ होते हुए बफलियाज़ की तरफ हम मुड़े थे। ठीक यहीं सेकरीब 84 किलोमीटर लंबी मौजूदा मुगल रोड शुरू होती है और पीर—पंजाल की जाने कितनी बुलंदियों के नज़ारे दिखलाती हुई श्रीनगर से कुछ पहले शोपियां तक बढ़ी चली जाती है। हमारे ड्राइवर ने हमसे कुछ पूछे-सुने बगैर यहां गाड़ी को जैसे लंगर डाल दिया। कुछेक कस्बाई दुकानों को देखकर हमारी नाक—भौं सिकोड़ने की तैयारी भी नहीं हुई थी कि उसकी ओर से जरूरी एलान आया — ‘बस पूरे रास्ते में यही दो-एक दुकानें हैं, जो खाना-पीना हो यहीं कर लो, फिर आगे कुछ नहीं मिलेगा।’ कुछेक चिप्स, बिस्किट के पैकेट हमने उठाए और बिना ज्यादा वक़्त खोए आगे बढ़ गए। बफलियाज़ के बाद से राह की रंगत और मिजाज़ बदलते से महसूस होने लगे थे। अब सड़कों पर बल ज्यादा पड़ने लगे थे और उंचाई भी लगातार बढ़ रही थी। पीर-पंजाल के सीने को चीरकर दौड़ते इस हाइवे के किनारे न बस्तियां थीं न लोग, न बाज़ार न गलियां और न शहर, न दुकानें। बस पहाड़िंया बराबर और उंची होती जा रही थीं और हमारे बदन पर एक—एक कर चुपचाप कब स्वेटर के बाद जैकेट—शॉल चढ़ने लगीं थीं, इसकी खबर हमें भी नहीं थीं।

यों सड़क इतनी सुनसान भी नहीं थी। इक्का—दुक्का गाड़ियां हमें आर-पार कर रही थीं। किसी मोड़ पर जवानों की पैनी निगाहें चौकसी में थी तो किसी मोड़ के कटते ही हम सीसीटीवीकैमरों में कैद हो रहे थे।जवानों की मुस्तैदी  दिल को सहारा दे रही थी, लेकिन फिर अगले कई किलोमीटर यों ही कटते। मोबाइल के सिग्नल भी धीमे पड़ते-पड़ते अब पीर पंजाल की पहाड़ियों की ओट में कहीं गुम गए थे।

‘मगर श्रीनगर के लिए वाया जवाहर सुरंग क्यों नहीं जाना चाहते आप ? वो रूट बिज़ी रहता है, रौनक जरूरी है सरे-राह! मुगल रोड से अभी कोई ज्यादा आमादरफ्त नहीं हुई है।’ जम्मू में हमारे हर शुभचिंतक की सलाह कमोबेश ऐसी ही थी। बस कुछ लफ्ज़ों का हेर-फेर होता था, कहना हर कोई यही चाह रहा था कि इस मुगल रोड के चक्कर में क्यों पड़े हो। बहरहाल, हम उस समय जम्मू-श्रीनगर के बीच परंपरागत हाइवे की बजाय इस वैकल्पिक रास्ते को टटोलने का मन बनाकर चले थे। इसी रूट पर मुगल रोड कार रैली होकर हाल फिलहाल गुजरी थी। 2010 से हर साल इस रैली को राज्य सरकार आयोजित करती आ रही है और पीर पंजाल के खूबसूरत नज़ारों को जज़्ब करते हुए एडवेंचर प्रेमियों का पूरा कारवां इस सड़क को कुछ रोज़ के लिए ही सही, गुलज़ार कर गुज़र जाता है।

बफलियाज़ से इस पहाड़ी रास्ते की उंचाई बढ़ने लगी थी और इंजन की परख भी अब शुरू हो गई थी। सड़क पर छितराए कंकड़-पत्थर और कहीं-कहीं बड़े भारी चट्टानी पत्थरों को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि यह पहाड़ी रास्ता किन मुसीबतों से होकर कश्मीर पहुंचता है। बीच-बीच में क्रेनें और बुलडोज़र भी ज्यादा दिखने लगे हैं। कब, किस मोड़ पर पहाड़ रास्ता बंद कर दें, कहा नहीं जा सकता और तब इन मशीनों का ही आसरा होता है। नीचे घाटी में बादलों की धक्का—मुक्की कुछ बढ़ चली थी और अब हमें रास्ते के न वो झरने दिखे न नदी-नाले जो मुगल रूट का आकर्षण बढ़ाते हैं।

सड़क की चौड़ाई तेजी से घट रही थी मगर उतनी ही तेजी से उंचाई बढ़ती रही थी। अब रास्ता खतरनाक हो रहा था, एक तरफ गहराई में झांकने पर पानी की एक धारा दिखायी दी लेकिन अगला मोड़ काटते ही कहीं गुम हो गई। अगले मोड़ ने हमारे एडवेंचर का जैसे इम्तहान लेने की ठान रखी थी। यहां एक पुलिया पर काम चल रहा था और वाहनों के लिए एक संकरा, उबड़—खाबड़ रास्ता ही बचा था। सांस कुछ थमी—थमी सी थी इस राह परकि तभी ख्याल आया कि इन हैरान करती बुलंदियों और इम्तहान लेती सड़कों को जहांगीर ने कितनी बार नापा होगा। और इस ख्याल के आते ही हमारी सिहरन कुछ कम जरूर हुई थी!

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हर तरफ से घेरे पीर पंजाल पहाड़ियों की बुलंद हस्ती ही हमें हैरान करने के लिए जैसे काफी नहीं थी, सड़क के साथ—साथ अब लंबे-चौड़े चरागाह भी चल रहे थे। इन्हीं मैदानों पर बकरवाल अपने मवेशी चराते हैं और खतरनाक चढ़ाई चढ़ते हुए, दर्रों को लांघते हुए उनके होंठों पर जब-तब तैर आते हैं दुआओं के लफ्ज़। बहरामगला, नूरी छंब, चांदीमारा, डोगरिया और छत्तापानी होते हुए यह सड़क लगभग 11500 फुट पर सर्वाधिक बुलंदी पर पहुंचती है। और एकाएक किटकिटाते दांत, कांपते तन याद दिलाते हैं कि इस जगह तापमान उस गर्मी के मौसम में भी शून्य डिग्री के आसपास ही है। हम पीर की गली पहुंच चुके थे। कश्मीर घाटी में सोलहवीं सदी में इस्लाम की जड़ें सींचने वाले हज़रत सैयद अमीर कबीर, जिन्हें पीर हमदान भी पुकारा जाता है, भी इस राह से गुजरे थे और उनका मार्ग होने के चलते ही यह जगह पीर की गली के नाम से मशहूर हुई।

यहीं पीर पंजाल पर वो दर्रा है जिसे पार करने के क्रम में जाने कितने ही लोग और कितने ही मवेशी अपनी जान गंवा चुके हैं।

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हमारे आगे पीछे चल रही तमाम गाड़ियां यहां रुकीं। पुंछ से सवारियां भरकर लाए वाहनों में से लोकल कश्मीरी लोइयों में लिपटे अब बाहर निकल आए थे। पीर की गली उनके लिए इबादत की जगह थी, और हमारे भी लबों पर दुआएं तैर आयीं। इबादत के लिए हमारे भी पैर खुद-ब-खुद पीर बाबा की मज़ार की तरफ बढ़ चले थे। लोकल यात्रियों के दल में सिर्फ एक औरत थी और एक अनजाना-सा नाता हम दोनों के बीच उस एक पल में गहराया था। हम दोनों के सिर एक साथ सजदे में झुके थे, और सिर उठाते ही एक—दूसरे से नज़रें मिलीं थी। वो खुद ही बताने लगीं, ”गर्मियों के दिनों में तो इस रूट पर अब काफी आना-जाना हो गया है, हम सवेरे जल्दी निकलकर देर शाम अपने घरों को लौट आते हैं। वाकई सहूलियत हो गई है मुगल रोड बनने के बाद।’

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मुगल रोड ने पुंछ को टूरिस्टी नक्शे पर ला खड़ा किया है। पीर बाबा की ज़ियारत के लिए आने वाले लोगों की गिनती बढ़ गई है।

वाकई पुंछ, राजौरी जैसे जिलों के लिए यह रास्ता वरदान से कम नहीं है। कभी पुंछ से श्रीनगर तक की दूरी पारंपरिक रूट, यानी बनिहाल दर्रे से होते हुए लगभग 588 किलोमीटर हुआ करती थी वहीं अब मुगल रोड के रास्ते घटकर सिर्फ 126  किलोमीटर रह गई है। यानी कहां दो-दो रोज़ श्रीनगर पहुंचने में लगा करते थे और अब एक दिन में ही आना—जाना मुमकिन है।

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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