Yamuna Expressway – where speed gives more thrill!

 वीकेन्‍ड मस्‍ती का नया अड्डा बनने जा रहा है नया हाइवे 

दिल्‍ली से ताजनगरी का सफर इतना सुहाना पहले कभी न था। बेशक, एन एच 2 पर दौड़ते आए हैं बरसों से लेकिन यमुना एक्‍सप्रेस वे ने, जो कभी ताज एक्‍सप्रेसवे के नाम से बनना शुरू हुआ था,  सफर के पुराने सारे समीकरणों को धराशायी कर दिया है।

स्‍वप्निल सफर की शुरूआत

करीब 165 किलोमीटर लंबे और 100 मीटर चौड़े इस हाइवे पर स्‍पीड ने रोमांच को एक नया आयाम दिया है। इसकी कंक्रीट की सतह पर अनुशासित दौड़ने का भी अपना एक अलग अंदाज़ है। हिंदुस्‍तान में रहते हुए विदेश की सड़कों पर फर्राटा सफर का लुत्‍फ देते इस हाइवे ने वीकेन्‍ड मस्‍ती का एक नया विकल्‍प पेश कर दिया है। मौहब्‍बत की अनूठी मिसाल का दीदार करना तो अब बस बहाना होगा, असली कारण होगा इस नए हाइवे पर चमचमाती कारों से क्रूज़ करना।

तीन लेन वाला इतना कद्दावर नेटवर्क एनसीआर और दिल्‍ली के लिए खुला आमंत्रण है

कारों की स्‍पीड लिमिट 100 किमी प्रति घंटा बेशक तय हो, लेकिन ये भी तय है कि आप इस पर 120 से कम की रफ्तार पर दौड़ना नहीं चाहेंगे । और कारों पर लगाम कसने के लिए इस सफर में जगह-जगह सोलर पैनल से कनेक्‍टेड, चौबीसों घंटे पैनी निगाह रखने वाले सीसीटीवी कैमरे लगे हैं।

control..control …control ..your desire to cruise, You are being watched!

शहरों में रहकर, सफर कर सफरी साहित्‍य रचना महाचुनौती लगता हो जिन साहित्‍यकारों को उन्‍हें भी एक बार तो ये हाइवे कुछ लिखने-कहने-बयान करने के लिए जरूर ही ललचाएगा। सफरी दास्‍तान की एक बड़ी खूबी है कि वो इमर्सिव होता है, यानी पाठकों को अपने में डुबो देने वाला, भिगो देने वाला। उसी तर्ज पर यमुना एक्‍सप्रेस वे पर सफर भी एक नशे की तरह है, फर्राटा दौड़ में हल्‍केपन का अहसास है, रोमांच है, उल्‍लास भी है और अगर कुछ नहीं है तो वो है टेंशन और मारामारी जो हमारी राजधानी या एनसीआर की सड़कों पर आम हो चुकी है।

An ode to eternal love swamped by eager  tourists!

और इस हाइवे पर लगभग उड़ते हुए महज़ दो-ढाई घंटे में ताजमहल की हसीन इमारत आपके सामने होती है। वीकेन्‍ड या दो-एक छुट्टियों के वीकेन्‍ड के साथ जुड़ जाने पर शाहजहां के एलान-ए-मौहब्‍बत से रूबरू होने के लिए कुछ इस तरह से रहें तैयार। सैंकड़ों की तादाद में उतरे सफरबाज ताज पर टूट पड़े हैं, और टिकट काउंटर पर लंबी कतारें, ब्‍लैक में टिकटों की खरीद-फरोख्‍त से लेकर गाइडों की धींगामस्‍ती, रेंगती लाइनें, पूरी ताज नगरी में अफरातफरी, बदइंतजामी आपके अब तक के सफर से बने मिजाज़ को बिगाड़कर रख देगी।

लेकिन हर बात के दो पहलू होते हैं जिस तरह, उसी तरह इस पूरे अनुभव ने हमें ताज का दीदार एक नए एंगल से कराया। नोएडा से आगरा दो घंटे में पहुंचने के बाद आगरा से ताज तक पहुंचना अगले दो-ढाई घंटे में भी जब मुमकिन नहीं लगा तो हमने साइड से कट लेने में ही अपनी और अपने दिन की भलाई समझी। मालगोदाम वाली सड़क से निकलकर दो मिनट बाद ही हम पहुंच चुके थे मेहताब बाग और यहां से ताज का नज़ारा हमारी कल्‍पनाओं से परे था। और सबसे बड़ा सुकून तो ये था कि हमारे और ताज के संगमरमरी बदन के बीच बस यमुना थी …. आसमान पर भादो के बादल टंगे थे जो कल रात ही मूसलों बरसे थे और आज शहर की सड़कों पर मचे कोहराम के लिए कुछ हद तक ये भी जिम्‍मेदार थे ।

हमारे और ताज के संगमरमरी बदन के बीच बस यमुना थी

दिल्‍ली वाले जहां उतर जाते हैं वहीं अपनी छाप छोड़ जाते हैं। आगरा को क्‍यों बख्‍शते, कुछ घंटों में शहर भर के रेस्‍टॉरेन्‍ट-होटलों से खाना और पानी की बोतलें नदारद हो गईं, यहां तक कि फाइव स्टार होटल भी पूरे वीकेन्‍ड के लिए सोल्‍ड आउट की तख्‍ती लटका चुके थे ।

नया नवेला यमुना एक्‍सप्रेसवे शाहजहां और मुमताज महल तक पहुंचने का सुपरफास्‍ट हाइवे साबित हुआ। लेकिन एक बार फिर हमारे इंफ्रास्‍टक्‍चर की पोल खोल चुकी थी। एक वर्ल्‍ड क्‍लास एक्‍सप्रेसवे को आखिरकर उस शहर में लाकर पटक दिया गया जो कुछ हजारों की भीड़ संभालने में बुरी तरह नाकाम रहा था। लंबी-बड़ी कारों से शहर की बस्तियां चौर-बोर होने लगी थीं, आगरा शहर हैरान था, हलकान था और अपनी सड़कों पर अब भी लगातार पहुंच रहे काफिले को देखकर हतप्रभ था। अभी तो सवेरे की अलसाई आंखें भी पूरी तरह खुली नहीं थी, और उसकी बस्‍ती पर रात बरसे बादलों के बाद अब मनोरंजन के हर छोटे-बड़े अवसर को निगल जाने को आतुर दिल्‍ली-एनसीआर के परिन्‍दे भी परवाज़ भरकर पहुंचने लगे थे ।

starting point of Yamuna Expressway from Agra – wearing a deserted look

हमने एक बार फिर यमुना एक्‍सप्रेसवे की राह पकड़ ली थी, वापसी के लिए फिर अपने हवाई घोड़े पर सवार हो चुके थे। मानूसनी बादलों के बीच ढलते सूरज की लुकाछिपी से सफर की दिलचस्पियां लगातार बढ़ती रहीं।

मौसम आशिकाना हो तो सफर का मज़ा चौगुना हो जाता है

इस हाइवे ने लोकल लोगों को रोज़गार दिलाया है, कभी उनके विरोध को भी झेल चुका है और हिंसा से लेकर प्रदेश की राजनीति से होते हुए देश की राजनीति पर भी कई दिनों तक छाया रहा है। ले‍किन आज यह हाइवे स्‍थानीय बाशिन्‍दों के लिए मनोरंजन का जरिया बन चुका है अब। दिन भर आसपास के गांवों से बच्‍चे, बूढ़े, जवान जैसे हर कोई उठकर चला आया है सड़कों के सीनों पर से दहाड़ती दौड़ती गुजरती कारों और उनके सिरफिरे सवारों को देखने।

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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