Andaman – a land of eerie history and nature’s bounty!

काला पानी के सजायाफ्ता अपराधियों की चींख-पुकारों से आज भी सैलुलर जेल की दीवारें गूंज रही हैं, उसकी हवाओं में जेलर की क्रूरताओं के अफसाने घुले हैं और शहीदों के इंकलाब जिंदाबाद के नारे आज भी आपके सीनों में सरफरोशी की तमन्‍ना जगाते हैं। पोर्टब्‍लेयर में सैलुलर जेल की ताजा पुताई से रोशन दीवारों को रंगने की बेहिसाब कवायदों के बावजूद खून के छींटे धुल नहीं पाएंगे, और न ही वो काली इबारत कभी वक्‍त के गर्त में घुल सकेगी जिसने सुदूर समन्‍दर में खड़े इस द्वीप समूह को कभी देश की आजादी के नगमानिगारों की कालकोठरी बना डाला था।

साउंड एंड लाइट शो के दौरान जेल की रोशन कोठरियां कभी जुल्‍म की गवाह रही थीं

उसी इतिहास की एक झलक सैलुलर जेल में हर शाम दिखाए जाने वाले साउंड एंड लाइट शो में बखूबी मिलती है । ओम पुरी की बुलंद आवाज़ और दमदार शैली में जब यह शो सूर्यास्‍त के बाद शुरू होता है तो आज भी हाउसफुल का नज़ारा दिखता है । मगर सैलानियों को जैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके बैठने के लिए कुर्सियां बची हैं या नहीं, वो आसपास बिछी घास पर, पेड़ के नीचे या कंक्रीट के फर्श पर कहीं भी बैठकर आजादी के परवानों के रोंगटे खड़े कर देने वाले कारनामों और उन पर ढहाए गए जुल्‍मों की दास्‍तान को दम साधकर सुनते रहते हैं।

यही है आज का अंडमान जो काला पानी जैसे काले इतिहास को अपने सीने में छिपाए बंगाल की खाड़ी में सिर उठाए खड़ा है।

सैलुलर जेल, पोर्टब्‍लेयर

भारत की मुख्‍यभूमि से करीब 1330 किलोमीटर दूर समन्‍दर में उग आए इन द्वीपों को जैसे प्रकृति ने मोतियों की तरह सजाया है। बंगाल की खाड़ी में लगभग 800 किलोमीटर तक फैले ये द्वीप हिंदुस्‍तान से दूर हैं मगर बर्मा, थाइलैंड और यहां तक कि इंडोनेशिया की जमीन के ज्‍यादा करीब हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह यानी 574 छोटे-बड़े द्वीपों (जिनमें बमुश्किल 36 में ही बसावट है) के इस संघ शासित प्रदेश की राजधानी पोर्टब्‍लेयर के वीर सावरकर हवाई अड्डे पर विमान उतरने से कुछ पल पहले ही चांदी की लकीरों से घिरे हरे द्वीप अपनी ओर एकाएक ध्‍यान खींचते हैं। पहली बार मेरा मन हुआ कि काश यह हवाई सफर कभी खत्‍म न हो और मोतियों के इन टुकड़ों को देर तक यूं ही आसमान से निहारती रहूं। बहरहाल, विमान को तो उतरना था, जमीन पर उतरा, जो यहां बड़ी कंजूसी से प्रकृति ने दी है, लिहाजा हवाई पत्‍तन भी छोटा सा ही है। अलबत्‍ता, आसपास होटल सिर उठाए दिख रहे हैं जो कहते हैं कि सैलानियों का यहां स्‍वागत है।

अजीब भूमि है ये भी, सैलुलर जेल के बाहर चूड़ा पहने कोई पंजाबी कुड़ी अपने नवविवाहित पति के साथ हाथ में हाथ डाले दिखी तो लगा अजब विरोधाभास है यहां, जुल्‍म की दास्‍तान और हनीमून पर निकला जोड़ा, बड़ा विचित्र मेल लगा मुझे। बहरहाल, इस जेल की बंद सलाखों को देखने के क्रम में हम पहली मंजिल पर बनी उस कोठरी तक भी हो आए जहां कभी वीर सावरकर को बंद रखा गया था।

Inside Veer savarkar’s tiny cell

तभी एक मराठी सज्‍जन वहां पहुंचे, कोठरी के सामने नतमस्‍तक और कोठरी में टंगी सावरकर की तस्‍वीर का माल्‍यार्पण करने के बाद भी वे देर तक मुड़-मुड़कर उस गलियारे के अंतिम छोर पर बनी कोठरी को देखते रहे थे जहां कभी टाट-बोरे के मोटे कपड़ों और बेडि़यों की वजह से रिसते खून से सने कई कई जोड़ी पैर गुजरे होंगे।

वीर सावरकर की कोठरी

करीब सवा सौ साल पहले जब अंग्रेज़ी हुक्‍मरानों ने इस जेल को बनवाया था तो वे सिर्फ उन कैदियों को यहां भेजा करते थे जिन्‍होंने वाकई उनकी नाक में दम कर रखा था – हार्डकोर देशभक्‍त। रूखी सूखी रोटियां, कंकड़ और कीड़ों से भरी पनियाली दाल, बेरहमी से पीठ पर बरसते कोड़े, और उस पर अंडमान की प्रक़ति की वजह से आए दिन फैलने वाले रोग अक्‍सर कैदियों को बेमौत मार डाला करते थे। यानी जब देशभक्‍त के सीने में जगे जज्‍़बातों को दबा पाना मुश्किल हो जाता और सत्‍ता की बुनियाद हिलने लगती तो ऐसे क्रांतिकारी वीरों को इस जमीन पर लाकर पटक दिया जाता था।

सैलुलर जेल में म्‍युजि़यम में प्रदर्शित कैदियों के वस्‍त्र जो बयान हैं अंग्रेज़ी हुक्‍मरानों की बर्बरता और क्रूरता का

उंची दीवारों और चारों तरफ समन्‍दर से घिरी इस जेल से निकल भागना लगभग नामुमकिन था । फिर भी प्रयास करते थे कुछ दुस्‍साहसी वीर, पकड़े भी जाते थे और तब उनकी सजा कई गुना बढ़ा दी जाती ।

यही है वो जेल जिसने अंडमान की जमीन को काला पानी बना दिया था

अंडमान में आए अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे और हम देशभक्ति की अच्‍छी खासी खुराक ले चुके थे ।अगली सुबह 11 बजे ही फिनिक्‍स बे जेटी पहुंच गए जहां से हैवलॉक आइलैंड के लिए फैरी में सवार हो गए। एम वी बम्‍बुका फैरी का सफर सुखद था, इस एसी फैरी ने अभी तट छोड़ा ही था कि एक-एक कर हर यात्री अपनी सीट पर सामान फेंककर डैक पर पहुंचने लगा। सोचा हमें भी रुख कर लेना चाहिए, और फैसला अच्‍छा निकला क्‍योंकि उसके बाद अगले करीब दो घंटे के सफर में बादलों से घिरे आसमान ने कभी बौछारों से धुला हमें तो कभी समन्‍दर की लहरों पर उड़ान भरती नन्‍ही चिडि़याओं की धमा-चौकड़ी देखने में ही सारा समय बीत गया।

पोर्टब्‍लेयर से हैवलॉक आइलैंड तक के सफर में ऐसे खूबसूरत नज़ारे आपको बार-बार दिखेंगे

कुछ पल कैप्‍टन के साथ जा बैठे तो पता चला कि जिन्‍हें चिडि़या समझ रहे थे वो वास्‍तव में, फ्लाइंग फिश थीं । तभी दूर दिखती हरियाली की ओर इशारा कर कैप्‍टन ने बताया कि वही है हमारी मंजिल । लहरों की थपेड़ों ने फैरी को इतना हिला-डुला दिया था कि डैक से नीचे लौटने पर देखा कि हर तरफ सामान बेतरतीब पड़ा था। किसी के बैग से लोनली प्‍लैनेट झांकती दिखी तो किसी की बिसलेरी की बोतल फर्श पर सैर कर रही थी। इस बीच, आसमान में एक इंद्रधनुष भी टंग आया था। प्रक़ति ने जैसे तस्‍वीर को पूरा कर दिया था। हैवलॉक आइलैंड पर फैरी को अलविदा कहकर हमने बमुश्किल बीस कदम ही बढ़ाए होंगे कि भारतीय स्‍टेट बैंक की हैवलॉक शाखा दिखायी दी। हिंदुस्‍तान के कोने कोने में सफर पर हो आइये, भारतीय स्‍टेट बैंक के एटीएम और बीएसएनएल का सिग्‍नल काफी दूर तक साथ निभाते हैं ! अंडमान की इस सरजमीं पर भी हमें इन दोनों का ही आसरा था, हमें बताया गया कि हैवलॉक क्‍या और तमाम द्वीपों पर एटीएम तो क्‍या बैंक भी अब शायद ही मिलें, सो अपनी जेबें भरने से यहां चूकना नहीं। हैवलॉक जेटी से बाहर आते ही ऑटो चालकों और टैक्सियों की मौजूदगी हतप्रभ न सही मगर सुकून में जरूर डालती है। हमने इको विला को यहां अपनी सैरगाह के तौर पर चुना था जो करीब दो-ढाई किलोमीटर दूर है, लिहाजा ऑटो पर लद चुके हैं। ऑटो चालक बंगाली है, अंडमान में सरकार ने पश्चिम बंगाल से यहां लाकर आबादी बसायी थी, पोर्टब्‍लेयर में जरूर कुछ तमिल चेहरे दिखे थे लेकिन अब सिर्फ बंगला जुबान है और बंगाली चेहरे। हैवलॉक के वर्षा वनों के सीने पर से एक सड़क गुजर गई है जो इस आइलैंड के एक कोने से दूसरे कोने तक जाती है। करीब बीस-पच्‍चीस मिनट में आप इन दोनों सिरों को छूकर आ सकते हैं ! बस इतनी सी जमीन का टुकड़ा आया है इस खूबसूरत और अंडमान के सबसे विख्‍यात द्वीप के हिस्‍से में। इको विला (http://www.havelock.co.in/), बीच नंबर 2 हमने बिना किसी जोड़ गणित के, बिना किसी की सिफारिश के चुन लिया था, बस इंटरनेट बुकिंग के क्रम में उसका नाम सामने आया और हमने दो रोज़ के लिए एक विला अपने नाम करा लिया । यहां पहुंचकर मालूम हुआ कि निकोबारी हटों वाले इस इको रेसोर्ट के आंगन में अपना खुद का समन्‍दर का एक टुकड़ा भी था। हम जब दोपहरी में यहां पहुंचे थे तो लो टाइड का वक्‍त था और तमाम पेड़ों की जड़ें तक साफ दिख रही थीं। इस हिस्‍से में कोरल लाइफ भी थी जो अब भाटे की वजह से उतर चुके पानी में साफ दिखायी दे रही थी ।

इको विला के आंगन में खड़ा है समन्‍दर का ये खूबसूरत टुकड़ा

हमने अपनी किस्‍मत को सराहा और यहां ठहरने के अपने इरादों पर खुद ही खुद की पीठ ठोंक ली।

इको विला में निकोबारी हट, हैवलॉक

जारी रहेगा अंडमान का सफर ….

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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