Writings On The Wall

हिंदुस्‍तान की सड़कों  पर सफर का गारंटीशुदा सबूत !

फिर सफर में हूं, फिर सड़क पर हूं। पटना, बिहार से देवघर, झारखंड के हाइवे नंबर 31 पर हमारी टैक्सी दौड़ रही है। शहर की बाहरी दीवारों पर फिर दिखायी पड़ने लगे हैं वो संदेश जो देशभर में अक्सर दिखायी देते हैं और आपको याद दिलाते हैं कि आप वाकई सफर में हैं!  ‘ ‘नामर्द, कमजोर रोगी मिलें ’’,  ‘ ‘स्वप्नदोश और धात रोग से पीड़ितों का पक्का, गारंटीषुदा इलाज यहां होता है ’’,  ‘ ‘गुप्त रोगी निस्संकोच मिलें’’। तबसे इन संदेशों को देखती-पढ़ती आयी हूं जब ये रोग समझ से परे हुआ करते थे। आज जब इनके मायने समझ में आने लगे हैं तो मन में अक्सर सवाल उठता है कि क्या सारे गुप्त रोगी शहरों से बाहर बसते हैं? तो फिर शहरी सीमाओं से बाहर आते ही, रेलवे की पटरियों से, टैक्सियों की खिड़कियों से बिना नागा ये संदेश क्यों दिखायी देने लगते हैं? क्या यहां बसने वाली हिंदुस्तान की आबादी सचमुच नामर्दी, कमजोरी से पीड़ित होती है या फिर उनकी साफगोई है कि वे अपनी जिस्मानी कमजोरियों को छिपाने की बजाय उनके बारे में खुलकर समाधान तलाशने से संकोच नहीं करते?

जवाब तो इन सवालों के नहीं मिल पाए कभी, अलबत्ता इतना जरूर है कि नीम-हकीमों, झोला छाप डॉक्टरों के सफेदी में नहाए ये खुल्लमखुल्ला संदेश इस बात की गारंटी होते हैं कि हम अपने सफर में आगे की मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं! पूर्व से पश्चिम तक हो आइये, या उत्तर से दक्षिण की तरफ बढ़ जाइये, सैक्स रोगियों की मुसीबतों को कम करने का दावा करने वाले विज्ञापन कभी आंखों से ओझल नहीं होते!!
– जमुई, बिहार/15 जून ’12, दोपहर 2.30 बजे

About Alka Kaushik

I am an Independent travel journalist, translator, blogger and inveterate traveller, based out of Delhi, India. I have been a food columnist for Dainik Tribune besides contributing or Dainik Bhaskar, ShubhYatra, Rail Bandhu, Jansatta, Dainik Jagran etc. My regular column on the portal The Better India - Hindi is a widely read and shared column with travel stories from around India.

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